जयपुर: हर वर्ष 28 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व कार्यस्थल सुरक्षा एवं स्वास्थ्य दिवस सुरक्षित और स्वस्थ कार्यस्थलों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रतीक है. अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा शुरू किया गया यह दिवस श्रमिकों के जीवन, स्वास्थ्य और गरिमा की रक्षा के महत्व को दिखाता है. राजस्थान, जो कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा से जुड़े नियमों को लागू करने वाले अग्रणी राज्यों में रहा है, आज उसी मुद्दे पर सवालों के घेरे में है.
राज्य में महिलाओं की बढ़ती कार्य भागीदारी के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था कमजोर नजर आ रही है. निर्माण, खनन, कृषि और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं अक्सर यौन उत्पीड़न, असुरक्षित माहौल और स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करती हैं. 1992 में भंवरी देवी के साथ हुई घटना ने देश को झकझोरा था और इसी के बाद कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सख्त कानूनों की दिशा तय हुई.
बावजूद इसके, आज कई संस्थानों में आंतरिक शिकायत समितियां या तो सक्रिय नहीं हैं या केवल औपचारिकता बनकर रह गई हैं. विशेषज्ञों का मानना है एक दिन कार्यस्थल सुरक्षा एवं स्वास्थ्य दिवस या कानून बनाने से नहीं, बल्कि कानून का सख्ती से पालन, जागरूकता और जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना महिला श्रमिकों के लिए सुरक्षित कार्यस्थल बनाना संभव नहीं होगा.
बढ़ती भागीदारी, लेकिन सुरक्षा का अभाव : राजस्थान में महिलाओं की कार्यक्षेत्र में भागीदारी लगातार बढ़ रही है. वे अब केवल घरेलू दायरे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निर्माण कार्य, खनन, कृषि, वस्त्र उद्योग और मनरेगा जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं. यह बदलाव सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से सकारात्मक है, लेकिन इसके साथ ही महिलाओं के सामने सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम भी बढ़े हैं. कई मामलों में महिला श्रमिकों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षण और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलती.
असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है, जहां न तो स्पष्ट नियमों का पालन होता है और न ही शिकायतों के निवारण की प्रभावी व्यवस्था. महिला सामाजिक कार्यकर्ता निशा सिद्धू कहती है कि राज्य में कई क्षेत्रों- निर्माण, कृषि, घरेलू कार्य और औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाली महिलाएं आज भी यौन उत्पीड़न, मानसिक दबाव और शारीरिक हिंसा का सामना कर रही हैं. कई बार सामाजिक दबाव, नौकरी खोने का डर और जागरूकता की कमी के कारण महिलाएं शिकायत दर्ज नहीं करातीं, जिससे वास्तविक आंकड़े सामने नहीं आ पाते.
भंवरी देवी मामला : निशा सिद्धू कहती हैं कि राजस्थान में कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा की चर्चा भंवरी देवी के मामले के बिना अधूरी है. वर्ष 1992 में बाल विवाह रोकने के प्रयास के दौरान उनके साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म ने पूरे देश को झकझोर दिया था. इस घटना के बाद कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के खिलाफ सख्त कानूनों की मांग तेज हुई, जिसके परिणामस्वरूप ‘विशाखा गाइडलाइंस’ और बाद में कानून अस्तित्व में आए, लेकिन विडंबना यह है कि जिस राज्य ने इस दिशा में पहल की. वहीं, आज नियमों की अनदेखी आम हो गई है. राजस्थान में समय-समय पर सामने आने वाली घटनाएं कार्यस्थल सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर करती हैं.
जोधपुर और भीलवाड़ा जैसे जिलों में खनन क्षेत्रों में धंसने की घटनाओं में महिला श्रमिक भी प्रभावित हुई हैं. जयपुर और उदयपुर में निर्माण स्थलों पर सुरक्षा उपकरणों की कमी के कारण कई दुर्घटनाएं हुई हैं. वहीं, वस्त्र और पत्थर उद्योगों में काम करने वाली महिलाएं धूल और रसायनों के संपर्क में आने से श्वसन संबंधी बीमारियों का शिकार हो रही हैं. ये घटनाएं बताती हैं कि सुरक्षा मानकों का पालन अभी भी अधूरा है.
आंकड़े दिखा रहे गंभीर स्थिति :
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार: राजस्थान महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में लगातार शीर्ष राज्यों में शामिल रहा है.
- खनन क्षेत्रों में हादसे: जोधपुर और भीलवाड़ा जैसे जिलों में खदानों के धंसने की घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें महिला श्रमिक भी प्रभावित हुईं.
- निर्माण स्थलों पर दुर्घटनाएं: जयपुर और उदयपुर में निर्माणाधीन इमारतों से गिरने या सुरक्षा उपकरणों की कमी के कारण कई हादसे हुए हैं.
- फैक्ट्रियों में स्वास्थ्य जोखिम: वस्त्र और पत्थर उद्योगों में काम करने वाली महिलाओं को धूल और रसायनों के संपर्क में आने से श्वसन संबंधी बीमारियों का खतरा रहता है.
- राजस्थान दर्ज आंकड़े: जहां हर साल 40,000 से अधिक मामले दर्ज होते हैं.
इन घटनाओं में कार्यस्थल से जुड़े अपराध भी शामिल हैं :
- सरकारी तंत्र कमजोर: महिला श्रम भागीदारी बढ़ने के बावजूद सुरक्षा ढांचा कमजोर है.
- वास्तविक आंकड़े: असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली 70% से अधिक महिलाओं को किसी भी प्रकार की औपचारिक सुरक्षा या शिकायत तंत्र उपलब्ध नहीं है. राष्ट्रीय महिला आयोग को भी राज्य से कार्यस्थल उत्पीड़न की शिकायत मिलती रहती हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है. ये घटनाएं इस बात की ओर इशारा करती हैं कि सुरक्षा मानकों का पालन अभी भी कई जगहों पर अधूरा है.
कानून हैं, लेकिन पालन कमजोर : निशा सिद्धू कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि राजस्थान में कानून नहीं है. सख्त कानून है, लेकिन पलना कमजोर है. कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए ‘यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013’ लागू है. जिसके तहत हर संस्थान में आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का गठन अनिवार्य है, लेकिन राजस्थान में कई संस्थानों में यह समिति या तो बनी नहीं है या केवल औपचारिकता बनकर रह गई है. निशा कहती हैं कि नियमित बैठक, पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी के कारण कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है. महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सिर्फ कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका सख्ती से पालन, जागरूकता और जवाबदेही भी जरूरी है, तभी कार्यस्थल वास्तव में सुरक्षित और समान अवसर देने वाले बन पाएंगे.
क्यों महत्वपूर्ण है यह दिवस ? : यह दिवस केवल जागरूकता तक सीमित नहीं है, बल्कि ठोस बदलाव की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है. खासकर महिलाओं के संदर्भ में यह और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वे अक्सर असंगठित क्षेत्रों में काम करती हैं जहां सुरक्षा मानकों का पालन कमजोर होता है. महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ताओं सुमन देवठिया का मानना है कि विकास तभी सार्थक है जब वह सुरक्षित, सम्मानजनक और समावेशी हो.
राजस्थान में कार्यस्थल सुरक्षा को बेहतर बनाने के लिए कई ठोस कदम उठाने की जरूरत है. महिला श्रमिकों को सुरक्षा प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम उपलब्ध कराना, कार्यस्थलों पर सुरक्षा उपकरणों की अनिवार्यता सुनिश्चित करना और नियमित स्वास्थ्य जांच की व्यवस्था करना जरूरी है. इसके अलावा, सभी संस्थानों में आंतरिक शिकायत समितियों का प्रभावी गठन और निगरानी, सुरक्षित परिवहन और उचित कार्य समय सुनिश्चित करना तथा असंगठित क्षेत्र में श्रम कानूनों का सख्ती से पालन करना भी अहम कदम है.
सुरक्षित कार्यस्थल : सुमन देवठिया का मानना है कि सुरक्षित कार्यस्थल किसी भी सशक्त समाज की नींव होते हैं, लेकिन इसके लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है. सुमन कहती हैं कि अक्सर सरकार और संस्थाएं महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनेक नीतियां और नियम तो बना देती हैं, लेकिन उनके प्रभावी क्रियान्वयन में कमी रह जाती है. यही कारण है कि जमीनी स्तर पर अपेक्षित बदलाव दिखाई नहीं देता. कार्यस्थलों पर आंतरिक शिकायत समितियों का गठन, सुरक्षा मानकों का पालन और नियमित निरीक्षण जैसे प्रावधान कई बार केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं.
सुमन देवठिया के अनुसार, यदि नीतियों को सख्ती से लागू किया जाए और समय-समय पर उनकी समीक्षा की जाए तो महिलाओं के लिए कार्यस्थलों को सुरक्षित बनाया जा सकता है. जब महिलाएं बिना किसी भय, भेदभाव या उत्पीड़न के काम करती हैं, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे अपनी पूरी क्षमता के साथ योगदान देती हैं. यह न केवल उनके व्यक्तिगत विकास को बढ़ावा देता है, बल्कि संस्थानों की उत्पादकता और देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है.
सुरक्षित कार्यस्थल महिलाओं के अधिकारों की रक्षा का आधार है और यह सुनिश्चित करता है कि उन्हें समान अवसर मिलें. इसके लिए सरकार, निजी संस्थानों और समाज को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी. जागरूकता अभियान, प्रशिक्षण कार्यक्रम और सख्त निगरानी तंत्र विकसित करना समय की जरूरत है. यदि नीतियां केवल कागजों तक सीमित रहेंगी, तो उनका कोई वास्तविक प्रभाव नहीं होगा. इसलिए जरूरी है कि नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, तभी एक सुरक्षित, समान और प्रगतिशील समाज का निर्माण संभव हो सकेगा.
