
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा महंगाई भत्ता (डीए) मामले में पंजाब सरकार के कर्मचारियों और पेंशनरों के पक्ष में फैसला सुनाए जाने के बाद इस विवाद ने नया कानूनी मोड़ ले लिया है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद कर्मचारियों और पेंशनरों ने संभावित कानूनी चुनौती को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में पहले ही कैविएट दायर कर दी है। यह कैविएट 5 अगस्त को दाखिल की गई, ताकि भविष्य में यदि सरकार सुप्रीम कोर्ट का रुख करे तो कर्मचारियों का पक्ष सुने बिना कोई अंतरिम आदेश पारित न हो सके। कर्मचारी संगठनों को आशंका है कि पंजाब सरकार हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दाखिल कर सकती है। इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए कर्मचारियों ने एहतियातन कैविएट दाखिल की है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार कैविएट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि अदालत किसी भी पक्ष को राहत देने से पहले दूसरे पक्ष को सुनवाई का पूरा अवसर दे।
यदि पंजाब सरकार हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करती है तो अदालत कर्मचारियों और पेंशनरों को नोटिस जारी किए बिना सरकार को कोई अंतरिम राहत या स्टे नहीं दे सकेगी। पहले कर्मचारियों का पक्ष सुना जाएगा और उसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट किसी प्रकार का अंतरिम आदेश पारित करेगा। इससे कर्मचारियों को अपनी दलीलें रखने का पूरा अवसर मिलेगा। गौरतलब है कि पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को सख्त निर्देश देते हुए 15 दिनों के भीतर लगभग 8 लाख कर्मचारियों और पेंशनरों को लंबित महंगाई भत्ते का भुगतान करने का आदेश दिया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित समय सीमा के भीतर डीए जारी नहीं किया गया तो सरकार को देरी की अवधि पर 6 प्रतिशत ब्याज भी देना होगा। हाईकोर्ट के फैसले के बाद अब पूरे मामले पर कर्मचारियों और सरकार दोनों की नजर सुप्रीम कोर्ट की संभावित कानूनी प्रक्रिया पर टिकी हुई है। यदि सरकार अपील करती है तो यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत में पहुंचेगा, जबकि कैविएट दाखिल होने के कारण कर्मचारियों का पक्ष सुने बिना सरकार को तत्काल राहत मिलना आसान नहीं होगा। ऐसे में आने वाले दिनों में डीए विवाद का अगला चरण कानूनी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
