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Home » Blog » मयंक वशिष्ठ: कठिन परिश्रम और अनुशासन से भारतीय थल सेना में अधिकारी बनने की प्रेरक कहानी
उत्तराखंड

मयंक वशिष्ठ: कठिन परिश्रम और अनुशासन से भारतीय थल सेना में अधिकारी बनने की प्रेरक कहानी

lokmatujala
Last updated: September 7, 2025 3:23 pm
By lokmatujala
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3 Min Read
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उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के छोटे से गांव गुनाऊं से एक प्रेरणादायक खबर सामने आई है। मयंक वशिष्ठ ने अपनी कड़ी मेहनत, अनुशासन और लगन के दम पर भारतीय थल सेना में लेफ्टिनेंट बनने का गौरव प्राप्त किया। इस उपलब्धि ने न केवल उनके परिवार का बल्कि पूरे जनपद का नाम रोशन किया है। मयंक की सफलता यह साबित करती है कि सच्चा जुनून, सही मार्गदर्शन और लगातार मेहनत किसी भी सपने को साकार कर सकते हैं। उन्होंने अपने सफर में कई चुनौतियों का सामना किया, लेकिन हर मुश्किल को पार करते हुए अपने और परिवार के सपने को हकीकत में बदला।

Contents
परिवार की प्रेरणादायक कहानीगांव में खुशी की लहर

परिवार की प्रेरणादायक कहानी

मयंक वशिष्ठ रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि ब्लॉक के छोटे से गांव गुनाऊं के मूल निवासी हैं। उनके पिता, गिरीश चंद्र वशिष्ठ, भारतीय सेना में सिपाही रह चुके हैं, जबकि माता, सुशीला वशिष्ठ, एक आदर्श गृहिणी हैं जिन्होंने अपने बच्चों को संस्कारों के साथ ऊँचे आदर्शों की सीख दी। मयंक की बड़ी बहन, नूतन वशिष्ठ, ने माउंट एवरेस्ट फतह कर उत्तराखंड और भारत का नाम अंतरराष्ट्रीय मंच पर रोशन किया। उनके बड़े भाई प्रियंक वशिष्ठ वर्तमान में मुंबई में कार्यरत हैं। अब मयंक ने भी सेना में अधिकारी बनकर परिवार की गौरवशाली परंपरा को और ऊंचाई दी है।

गांव में खुशी की लहर

मयंक वशिष्ठ की इस सफलता की खबर गुनाऊं गांव में उत्सव की तरह फैली। ग्राम प्रधान आलोक रौतेला ने कहा, “मयंक जैसे युवा हमारे समाज के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सीमित संसाधनों में भी अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है।” पूर्व ग्राम प्रधान बृजभूषण वशिष्ठ, कमल सिंह रौतेला, रघुवीर सिंह, हीरामणि भट्ट, प्रकाश भट्ट, अनिल भट्ट, अनिरुद्ध वशिष्ठ, शिक्षक गजेंद्र रौतेला, कीर्तन मंडली की अध्यक्ष माहेश्वरी देवी, ममता रौतेला और अन्य ग्रामवासियों ने मयंक को बधाई दी और भगवान केदारनाथ से उनके उज्ज्वल भविष्य, उत्तम स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना की। मयंक वशिष्ठ की कहानी यह संदेश देती है कि सपनों को पूरा करने के लिए दृढ़ निश्चय और मेहनत ही सबसे बड़ा हथियार है। उनका यह सफर न केवल उनके परिवार के लिए गर्व का विषय है, बल्कि पूरे रुद्रप्रयाग जिले और उत्तराखंड के युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत भी बन गया है। मयंक की उपलब्धि यह भी याद दिलाती है कि छोटे गांवों के युवा भी मेहनत, अनुशासन और सही मार्गदर्शन के साथ बड़े मुकाम हासिल कर सकते हैं।

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