जस्टिस जगमोहन बंसल ने निर्णय देते हुए कहा कि अत्यधिक देरी के बाद समीक्षा शक्तियों का प्रयोग कानून की भावना के विपरीत है।
क्या था मामला
मामला हरियाणा पुलिस के कर्मचारी सतबीर सिंह से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 1989 में बतौर कांस्टेबल सेवा शुरू की थी और बाद में पदोन्नति पाकर विभिन्न पदों पर कार्य किया।
वर्ष 2006 में नारनौल में जिला पुलिस निरीक्षक के रीडर पद पर तैनाती के दौरान वाहन पंजीकरण फाइलों में कथित फर्जी मोहर और हस्ताक्षर इस्तेमाल किए जाने के आरोपों को लेकर विभागीय जांच शुरू हुई थी। इस मामले में एक एफआईआर भी दर्ज हुई, हालांकि उसमें सतबीर सिंह का नाम शामिल नहीं था।
विभागीय जांच में मिले थे निर्दोष
प्रारंभिक और नियमित दोनों विभागीय जांच में सतबीर सिंह को निर्दोष पाया गया। 13 अक्तूबर 2008 को पुलिस अधीक्षक ने जांच अधिकारी की रिपोर्ट स्वीकार करते हुए कार्रवाई समाप्त कर दी थी।
इसके बावजूद लगभग ढाई वर्ष बाद, 15 अप्रैल 2011 को तत्कालीन आईजीपी रेवाड़ी ने पंजाब पुलिस नियम 16.28 के तहत समीक्षा अधिकार का प्रयोग करते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया और 4 अक्तूबर 2011 को तीन वार्षिक वेतन वृद्धि स्थायी रूप से रोकने की सजा सुना दी। इस आदेश के खिलाफ दायर अपील भी डीजीपी स्तर पर खारिज कर दी गई।
एसीआर भी की गई थी डाउनग्रेड
इसके अतिरिक्त, वर्ष 2019 में अधिकारी की वर्ष 2006-07 की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) को भी उसी सजा के आधार पर डाउनग्रेड कर दिया गया था।
कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भले ही नियम में समीक्षा के लिए निश्चित समय-सीमा तय नहीं है, लेकिन इस अधिकार का प्रयोग ‘उचित अवधि’ के भीतर ही किया जाना चाहिए। अत्यधिक देरी के बाद की गई कार्रवाई न्यायसंगत नहीं मानी जा सकती।
