शिमला: चुनावी साल नजदीक आते ही हिमाचल की सियासी झील में बुधवार को एक ऐसा कंकर गिराया गया कि सवाल, जिज्ञासा और कौतुहल की अनेक लहरें उठ गई. हिमाचल में सत्ता की कमान संभाल रहे सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार ने अचानक से एक अधिसूचना जारी की. औपचारिक सरकारी शब्दावली में तो ये अधिसूचना हिमाचल में प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन को लेकर बनाए गए आयोग से जुड़ी थी, लेकिन साधारण जनता के लिए ये अधिसूचना हिमाचल में नए जिलों के बनाए जाने का पहला कदम थी.
हिमाचल में समय-समय पर नए जिलों के गठन की जरूरत पर बात होती रही है. हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के एक साल बाद यानी वर्ष 1972 में आखिरी बार जिले बने थे. उस समय हिमाचल में कांगड़ा से अलग कर ऊना व हमीरपुर जिला बनाए गए. उसके बाद से हिमाचल में जिलों की संख्या अब तक बारह ही रही है. अब 54 साल बाद इस सिलसिले में प्रभावी कदम उठाया गया है.
ऐसे में आम जनता के मन में कई सवाल उठ रहे हैं. क्या इन जिलों के गठन के लिए आवश्यक संसाधन व पैसा सरकार के पास है? क्या नए जिलों के अस्तित्व में आने के बाद आम जनता का जीवन सुगम होगा? क्या आर्थिक संकट से जूझ रहे राज्य के खजाने में इस मुहिम के लिए पर्याप्त पैसा है? क्या ये सियासी दाव है या फिर गंभीर कदम? क्या छह महीने में आयोग की रिपोर्ट व सिफारिशें आने के बाद सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार आगे बढ़कर निर्णायक फैसला लेगी? इन सभी सवालों की पड़ताल यहां करेंगे.
इससे पहले यहां दर्ज करते हैं कि सुक्खू सरकार ने हिमाचल में नए जिलों के गठन की संभावनाएं तलाशने के लिए आयोग बनाया है. हिमाचल हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति धर्मचंद चौधरी इस आयोग के मुखिया बनाए गए हैं. उनके अलावा सदस्यों में एडवोकेट विशाल पंवार, पूर्व आईएफएस अधिकारी राजेश शर्मा व लैंड रिकाड्र्स डिपार्टमेंट के निदेशक इसके सदस्य सचिव होंगे. आयोग सभी संबंधित पक्षों से चर्चा के बाद छह महीने में अपनी रिपोर्ट व सिफारिशें सरकार को सौंपेगा.
अभी क्या है हिमाचल की स्थिति?
हिमाचल प्रदेश छोटा पहाड़ी राज्य है. यहां अभी कुल 12 प्रशासनिक इकाइयां यानी जिले हैं. ये जिले शिमला, सोलन, सिरमौर, बिलासपुर, हमीरपुर, ऊना, कांगड़ा, चंबा, मंडी, किन्नौर, कुल्लू व लाहौल-स्पीति के रूप में हैं. हिमाचल में 68 विधानसभा क्षेत्र और चार संसदीय क्षेत्र हैं. आबादी के लिहाज से देखें तो 2011 की जनगणना के अनुसार यहां 68 लाख से अधिक की जनसंख्या है. अब अनुमानित जनसंख्या 75 लाख के करीब है.
हिमाचल की राजधानी शिमला है और यहां की आबादी ढाई लाख के करीब है. शिमला हिमाचल प्रदेश का सबसे बड़ा शहर है। इसके अलावा बड़े शहरों में सोलन, मंडी, सुंदरनगर, हमीरपुर, बिलासपुर, कुल्लू, चंबा, पालमपुर, धर्मशाला, नाहन आदि हैं. हिमाचल में 52 कस्बे हैं। साथ ही 81 उपमंडल, 193 तहसीलें व सब-तहसीलें हैं. यहां का क्षेत्रफल 55 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक है. चूंकि ये एक पहाड़ी राज्य है, लिहाजा यहां आबादी छितरी हुई है और कोई विशाल शहर या महानगर यहां संभव नहीं है.
नए जिलों के गठन के पक्ष में तर्क
अकसर नए जिलों के पक्षधर ये तर्क देते हैं कि दूरस्थ इलाकों के लोग जरूरी काम के लिए जिला मुख्यालयों तक आसानी से नहीं पहुंच पाते हैं. हालांकि राज्य की समय-समय की सरकारों ने आम जनता की सहूलियत के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे मिनी सचिवालय आदि, परंतु दुर्गम इलाकों में अन्य कठिनाइयों का समाधान नहीं हुआ है. जैसे हाल ही में सीएम सुक्खू ऊपरी शिमला के काशापाट इलाके में गए थे तो वहां आवागमन के लिए सड़कों की स्थिति अच्छी नहीं है. ऐसे ही अन्य कई इलाके हैं.
वहीं, एक तर्क ये है कि बेहतर प्रशासनिक दक्षता के लिए छोटी इकाई में सहूलियत है. एक तर्क ये भी है कि राज्य के सबसे बड़े जिला कांगड़ा को एक ही जिला मुख्यालय से संभालना कठिन है. नए जिले बनेंगे तो डीसी, एसपी व अन्य प्रशासनिक अमला समीप ही उपलब्ध होगा. साथ ही बजट का आवंटन भी इलाकों की जरूरत के हिसाब से हो सकेगा. इसके अलावा ये भी विचार साझा किया जाता है कि नई इकाइयों का गठन हो या मौजूदा का पुनर्गठन या फिर नया सीमांकन, उससे क्षेत्र विशेष की जनता की आकांक्षाओं को स्वर मिलेगा.
पहले भी उठा था मामला
हिमाचल में नए जिलों के गठन का मुद्दा कोई नया नहीं है. पूर्व में भी इस पर चर्चा होती रही है. पूर्व सीएम प्रेम कुमार धूमल के समय में वर्ष 2002 में इस पर सुगबुगाहट शुरू हुई. ये माना जाता रहा है कि कांगड़ा का विभाजन करके नए जिले बनाए जाएं. उनमें नूरपुर, पालमपुर, देहरा का नाम लिया जाता रहा. फिर मंडी में सुंदरनगर, धर्मपुर, सरकाघाट, करसोग की चर्चा होती रही.
शिमला में रामपुर को नया जिला बनाने का स्वर उठता रहा. धूमल सरकार के दूसरे कार्यकाल में कैबिनेट मंत्री रविंद्र सिंह रवि ने भी देहरा, पालमपुर व नूरपुर को जिला बनाने का पक्ष लिया था. वीरभद्र सिंह के आखिरी कार्यकाल में भी नए जिलों की संभावना पर विचार करने की बात हुई, लेकिन ये पहली दफा हुआ है कि किसी सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर आयोग का गठन किया है.
विपक्ष ने उठाए सवाल
सुक्खू सरकार की तरफ से नई प्रशासनिक इकाइयों के गठन या पुनर्गठन को लेकर विपक्षी दल भाजपा ने सवाल उठाए हैं. पूर्व सीएम व नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि सुक्खू सरकार यदि नए जिलों के गठन के लिए इतनी ही गंभीर थी तो पांच साल के कार्यकाल में अब जाकर ये कदम क्यों उठा रही है? चुनावी साल नजदीक आने पर ऐसे कदम उठाने की नीयत को जनता भली-भांति समझती है.
सुक्खू सरकार पर तीखे वार करने में हमेशा अग्रणी रहे धर्मशाला के विधायक सुधीर शर्मा ने तंज कसते हुए कहा-‘घर में नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने’. सुधीर शर्मा ने राज्य की कमजोर वित्तीय स्थिति का हवाला दिया और कहा कि ऐसे में नए जिलों के गठन की कवायद सिर्फ शिगूफा है. इसके विपरीत सरकार को स्मार्ट वर्किंग की जरूरत है. सुधीर शर्मा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार के पास सड़कों के गड्ढे भरने लायक पैसे तो हैं नहीं और नए जिले बनाने चले हैं.
भावनात्मक, सामाजिक व सियासी सवाल
लेखक और कवि-संपादक नवनीत शर्मा का कहना है, “छोटे पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में कठिन वित्तीय परिस्थितियों के ऐसे समय में नए जिलों के गठन की बात करना कई सवाल पैदा करता है. ये केवल एक सियासी मुद्दा ही नहीं है, बल्कि भावनात्मक मुद्दा भी है. आम लोग स्थान विशेष से अपनी पहचान जोड़ते हैं. नए जिलों के गठन के बाद उनकी पहचान नई होगी. जिलों का गठन केवल भौगोलिक जोड़-घटाव ही नहीं है”.
नवनीत शर्मा के अनुसार चुनावी साल नजदीक आ रहा है. आयोग को छह माह में रिपोर्ट देनी है. यदि आयोग का कार्यकाल बढ़ाने की नौबत आती है तो उस समय राज्य में चुनावी माहौल होगा. इस अवधि में आम जनता वास्तविक मुद्दों से हटकर इसी बात पर चर्चा करती रहेगी कि कौन सा नया जिला बनेगा और कौन सा नहीं. ठीक इस समय जब तकनीक के युग में वैश्विक ग्राम की अवधारणा मजबूत है और तकनीक के सहारे संपर्क आसान हुआ है, नए जिलों के गठन को लेकर आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों को जानना दिलचस्प होगा. आयोग हितधारकों की आवाज को कैसे शब्द देगा और किस तरह की सिफारिशें सरकार के समक्ष रखेगा, ये जानना भी रोचक होगा.
खजाने को भी देखना होगा
राज्य सरकार के पूर्व वित्त सचिव केआर भारती का कहना है कि नए जिलों का गठन एक बड़ा काम है. इसके लिए राज्य के वित्तीय संसाधनों पर भी नजर रखनी होगी. आखिर एक जिला बनता है तो वहां प्रशासनिक अमला चाहिए होता है. डीसी, एडीएम, एडीसी, एसपी, डीएसपी, तहसीलदार आदि के अलावा इन्फ्रास्ट्रक्चर, फर्नीचर आदि का खर्च अलग से होता है. ऐसे में आने वाले समय में यदि नए जिलों की कोई संभावना बनती है तो उसे कैसे मूर्त रूप दिया जाएगा, ये सवाल अहम है. भारती का कहना है कि ऐसे कदम सियासी अधिक होते हैं. कांगड़ा जिला सबसे बड़ा है, लेकिन उसके विभाजन को वहां की जनता शायद ही स्वीकार करे. इन सारे पहलुओं को ध्यान से देखने की जरूरत है.
पूर्व आईएएस अधिकारी व दूसरी बार भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते जेआर कटवाल की प्रतिक्रिया अत्यंत संतुलित विचार सामने लाती है. कटवाल कहते हैं कि यदि प्रशासनिक दक्षता, मितव्ययता, आम जनता की सुविधा और पिछड़े इलाकों का ध्यान रखकर नए जिलों का गठन या मौजूदा इकाइयों का मर्जर आदि होता है तो ये अच्छी बात है. जेआर कटवाल का कहना है कि यदि ये चुनावी समय नजदीक आते देखकर सियासी मूव है तो इससे परहेज करना चाहिए था.
युवा विचारक पंकज कुमार का कहना है कि नए जिलों का गठन या मौजूदा जिलों को नया रूप देना जटिल काम है. एक इलाके की मांग, दूसरे इलाके का विरोध हो सकती है. अलबत्ता आयोग जब अपना काम करेगा तो हितधारकों के नए-नए विचार सामने आएंगे. इससे भविष्य की एक तस्वीर तो जरूर उभर कर सामने आएगी. अभी ये मुहिम आगाज के मुहाने पर है, इसके अंजाम तक के सफर पर नजर रखनी होगी. मूल ये है कि हिमाचल का हित हो, सियासत का नहीं.
खैर, अब न्यायमूर्ति धर्मचंद चौधरी की टीम अपना काम शुरू करेगी. आयोग के मुखिया के नाम में धर्म भी है और शीतल प्रकाश के प्रतीक चंद्रमा भी. फिर वे न्यायमूर्ति भी हैं. उम्मीद है कि ये आयोग भविष्य के हिमाचल के लिए कुछ नवीन विचार सामने लाएगा. बाकी मुहिम सिरे चढ़ती है या नहीं, ये आने वाला समय बताएगा.
