कुल्लू: हिमाचल प्रदेश में विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली सहकारी समितियों को अब राष्ट्रीय सहकार विकास निगम (एनसीडीसी) द्वारा अब 25 लाख रुपए तक का अनुदान (Grant) मिलेगा. इस अनुदान से गांवों में छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए सालों से मेहनत कर रही सहकारी समितियों के लिए नई उम्मीद जगी है. इस योजना के जरिए सीमित संसाधनों के बावजूद अपने क्षेत्र की आर्थिक गतिविधियों को मजबूत करने में जुटी सहकारी समितियों को आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा. ऐसे में अब अगर योजनाबद्ध तरीके से इस योजना का लाभ उठाया जाए तो स्थानीय स्तर पर भंडारण, प्रसंस्करण, विपणन और अन्य नवीन गतिविधियों को नई दिशा मिल सकती है.
हिमाचल में कितनी सहकारी समितियां?
भारत की अगर बात करे तो करीब 8.47 लाख सहकारी समितियां रजिस्टर हैं, जबकि हिमाचल प्रदेश में 5,792 सहकारी समितियां पंजीकृत हैं. राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम की सहकार नवाचार योजना (एसआईएस) के तहत पात्र सहकारी समितियों को शत-प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा. ज्यादा से ज्यादा सहकारी समितियों तक योजना की जानकारी पहुंचाने के लिए सहकारिता विभाग ने भी कवायद शुरू कर दी है. सहकारिता विभाग के अनुसार इच्छुक समितियों को निर्धारित एनसीडीसी आवेदन पत्र के साथ डीपीआर और जरूरी डॉक्यूमेंट्स प्रस्तुत करने होंगे.
“एनसीडीसी की ओर से जारी अधिसूचना के आधार पर सहकारिता विभाग की ओर से योजना की जानकारी सहकारी समितियों तक पहुंचाई जा रही है, ताकि अधिक से अधिक पात्र समितियां इसका लाभ उठा सकें.” – आशा शर्मा, सहायक पंजीयक, सहकारी समितियां, कुल्लू
ये समितियां कर सकती हैं आवेदन
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम की इस योजना के जरिए सहकारी समितियों को सिर्फ आर्थिक सहायता ही नहीं मिलेगी, बल्कि इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार, स्वरोजगार और सामूहिक आर्थिक विकास को भी नई गति मिलने की उम्मीद है. ऐसे में फिलहाल कृषि, डेयरी, मत्स्य पालन, वस्त्र, हस्तशिल्प, सेवा आदि क्षेत्रों में कार्यरत पात्र पंजीकृत प्राथमिक सहकारी समितियां जो एनसीडीसी सहायता के लिए पात्र हैं. इस योजना के तहत आवेदन कर सकती हैं.
क्या होती है सहकारी समिति ?
जिला कुल्लू विकास सहकार संघ के अध्यक्ष अनिल सूद ने बताया कि सहकारी समिति ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों के विकास के लिए बनाई जाती है. हिमाचल प्रदेश में हथकरघा, हस्तशिल्प, दुग्ध, कृषि सहित अन्य कार्यों से जुड़ी हुई समितियां काम कर रही हैं. सहकारी समिति के जरिए लोगों को इसमें जोड़ा जाता है और किसी भी कार्य करने के लिए सरकार और सहकारी विभाग से उन्हें ऋण मिलता है. इस ऋण से लोग छोटे से कार्य को शुरू कर उसे काफी बड़े स्तर पर ले जाते हैं. सहकारी समितियों के जरिए लोगों को आर्थिक रूप से संपन्न होने में भी मदद मिलती है और देश-विदेश में भी वह अपने उत्पाद विभिन्न बाजारों में बेच सकते हैं.
सहकारी सभा का इतिहास
संघ के अध्यक्ष अनिल सूद ने बताया कि हिमाचल प्रदेश में पहली सहकारी सभा (समिति) की स्थापना साल 1892 में ऊना जिले के पंजावर गांव में हुई थी. यह देश में सहकारिता आंदोलन की शुरुआत का भी एक ऐतिहासिक उदाहरण है. जो आधिकारिक सहकारी कानून (1904) लागू होने से बारह साल पहले गठित की गई थी. इसके बाद हिमाचल प्रदेश की स्थापना के तुरंत बाद साल 1948 में औपचारिक रूप से सहकारिता विभाग का गठन किया गया था. उसके बाद 1960 में हिमाचल प्रदेश राज्य सहकारी विकास महासंघ लिमिटेड की स्थापना की गई थी. आज हिमाचल प्रदेश में सैकड़ों ऐसी सफल समितियां हैं, जो कृषि, बागवानी, दुग्ध उत्पादन, मछली उत्पादन, हथकरघा के क्षेत्र पर बेहतरीन कार्य कर रही है.
कैसे बनती है सहकारी समिति ?
सहकारी समितियां कुल्लू की सहायक पंजीयक आशा शर्मा ने बताया कि सहकारी विकास समिति बनाने के लिए सबसे पहले कम से कम 10 सदस्यों का होना जरूरी है. जो मिलकर किसी साझा आर्थिक या सामाजिक उद्देश्य को पूरा करना चाहते हों. इस प्रक्रिया में प्रारंभिक बैठक और मुख्य प्रमोटर का चयन किया जाता है. 10 सदस्य आपस में मिलकर एक बैठक करते हैं. इस बैठक में समिति के उद्देश्य और नाम पर चर्चा होती है. उसके बाद कामकाज संभालने के लिए एक अध्यक्ष का चयन किया जाता है. उसके बाद समिति के उपनियम लिखे जाते हैं. जिसमें सदस्यता के नियम, शेयर की कीमत, मीटिंग, चुनाव और लाभ बांटने का तरीका स्पष्ट होता है. फिर समिति में शुरुआती पूंजी जुटाकर सभी सदस्य मिलकर शेयर के रूप में एक निश्चित राशि जमा करते हैं. जिससे समिति की शुरुआती पूंजी बनती है.
कैसे होती है सहकारी समिति की रजिस्ट्रेशन ?
सहायक पंजीयक आशा शर्मा ने बताया कि इसके बाद समिति में जरूरी डॉक्यूमेंट तैयार किए जाते हैं, जो कि पंजीकरण के लिए जरूरी होते हैं. इनमें सभी सदस्यों का पहचान पत्र, पता प्रमाण, सभी सदस्यों की पासपोर्ट साइज फोटो, ऑफिस के पते का प्रमाण तैयार किया जाता है. समिति के उपनियम की प्रतियां रजिस्ट्रार के पास पंजीकरण के लिए दी जाती है. डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के बाद रजिस्ट्रार संस्था को पंजीकृत कर लेता है और रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट मिल जाता है. रजिस्ट्रेशन के बाद समिति के नाम पर बैंक खाता और पैन नंबर लिया जाता है. पहली आधिकारिक मीटिंग में मैनेजिंग कमेटी के अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष का चुनाव होता है और उसके बाद समिति का काम शुरू होता है.
सहकारी समितियों को क्यों मिलेगा अनुदान ?
राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) अपनी सहकार नवाचार योजना (एसआईएस) के जरिए सहकारी क्षेत्र में नवाचार और आधुनिकीकरण को एक नई गति दे रहा है. यह अनुदान आधारित पहल प्राथमिक सहकारी समितियों को आशाजनक विचारों को व्यवहार्य उद्यमों में बदलने में मदद करने के उद्देश्य से शुरू की गई है. वित्तीय वर्ष 2025-26 में शुरू की गई यह योजना, पात्र सहकारी समितियों को नवोन्मेषी, व्यवहार्य और प्रभावशाली परियोजनाओं के लिए 25 लाख रुपए तक की पूर्ण अनुदान सहायता प्रदान करती है. इस पहल का उद्देश्य नई प्रौद्योगिकियों को अपनाना, नवोन्मेषी उत्पादों और सेवाओं का विकास, नए व्यावसायिक मॉडल, मजबूत बाजार संबंध और स्थिरता-उन्मुख समाधानों को बढ़ावा देना है. एनसीडीसी ने अतिरिक्त निधि की जरूरत होने पर अनुदान के साथ-साथ ऋण सहायता भी प्रदान की है.
क्यों महत्वपूर्ण है ये योजना ?
सहायक पंजीयक आशा शर्मा ने बताया कि यह योजना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि जमीनी स्तर पर काम करने वाली सहकारी समितियों के पास अक्सर नए विचार होते हैं, लेकिन उन विचारों को सैद्धांतिक चरण से आगे ले जाने के लिए पर्याप्त वित्त जुटाने में उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. अनुदान सहायता प्रदान करके एसआईएस उन सहकारी समितियों के लिए वित्तीय बाधा को कम करने में मदद कर सकता है. जो अपने संचालन को आधुनिक बनाना चाहती हैं.
