देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि जीईपी के माध्यम से राज्य की प्राकृतिक एवं पर्यावरणीय संपदा के योगदान का वैज्ञानिक एवं आर्थिक आकलन किया जा सकता है। इससे पर्यावरणीय संसाधनों के महत्व को समझने तथा राज्य की विकास योजनाओं एवं नीतियों में उनके योगदान को प्रभावी ढंग से शामिल करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने शनिवार देर शाम मुख्यमंत्री आवास में जीईपी की तकनीकी रिपोर्ट के विमोचन के अवसर पर विशेषज्ञों के साथ हुई बैठक में कहा कि राज्य की भौगोलिक एवं पर्यावरणीय परिस्थितियां विशिष्ट हैं। इसलिए राज्य के लिए जीईपी का ऐसा मॉडल विकसित किया जाना चाहिए, जो स्थानीय परिस्थितियों, आवश्यकताओं एवं संसाधनों के अनुरूप हो। उन्होंने विशेषज्ञों एवं वैज्ञानिक संस्थानों से इस दिशा में आवश्यक तकनीकी सुझाव एवं सहयोग प्रदान करने की अपेक्षा की।
विकास और पर्यावरण में संतुलन जरूरी
मुख्यमंत्री ने विकास और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन पर बल देते कहा कि हिमालय, वन, जलस्रोत, नदियां, जैव विविधता एवं अन्य प्राकृतिक संसाधन राज्य की महत्वपूर्ण ताकत हैं। इनका संरक्षण पर्यावरणीय संतुलन के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था, आजीविका एवं सतत विकास के लिए जरूरी है। विकास योजनाएं बनाते समय प्राकृतिक संसाधनों की क्षमता, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा।
आंकड़ाें को नीति निर्माण से जोड़ने पर बल
बैठक में विशेषज्ञों ने जीईपी के वैज्ञानिक आधार, पर्यावरणीय आंकड़ों के संकलन और उनके विश्लेषण को लेकर सुझाव दिए। इस दौरान वैज्ञानिक अध्ययनों और तकनीकी आंकड़ों को नीति निर्माण से जोड़ने और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने वाटर हार्वेस्टिंग को आमजन के लिए सरल और कम लागत वाला बनाने पर जोर दिया।
बैठक में पीएमओ के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो.अजय सूद, हेस्को के संस्थापक पद्मभूषण डा. अनिल प्रकाश जोशी, राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रो.शिव कुमार, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. परमिंदर मैन, आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. केके. पंत, यूकास्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत, शिक्षाविद् डॉ.रीमा पंत, सुरेंद्र सिंह मनराल, डा विपिन सती उपस्थित रहे।
