देहरादून। देश में मृदा एवं जल संरक्षण, जलागम प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। संस्थान के निदेशक ने गुरुवार को आयोजित प्रेस वार्ता में संस्थान की उपलब्धियों और उत्तराखंड में किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि संस्थान का मुख्यालय देहरादून में स्थित है और इसकी स्थापना 01 अप्रैल 1974 को हुई थी। संस्थान के आठ अनुसंधान केंद्र देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की समस्याओं के समाधान के लिए कार्य कर रहे हैं। आगरा, कोटा और वासद केंद्र बीहड़ क्षेत्रों, दतिया केंद्र बुंदेलखंड, बेल्लारी केंद्र काली मिट्टी वाले क्षेत्रों, जबकि चंडीगढ़, ऊटी और देहरादून केंद्र पर्वतीय एवं पहाड़ी क्षेत्रों से जुड़ी समस्याओं पर अनुसंधान कर रहे हैं। वहीं कोरापुट केंद्र झूम खेती से संबंधित चुनौतियों पर कार्यरत है।
डॉ. भट्ट ने बताया कि संस्थान ने मृदा अपरदन नियंत्रण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, भूमि सुधार और निम्नीकृत पारिस्थितिक तंत्रों के पुनर्वास के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का विकास किया है। इन तकनीकों के प्रयोग से मिट्टी के कटाव और जल बहाव में कमी आई है, मृदा की नमी बढ़ी है और कृषि उत्पादकता के साथ किसानों की आय में भी सुधार हुआ है।
उन्होंने कहा कि देश में हर वर्ष लगभग 5.11 बिलियन टन मिट्टी का कटाव होता है, जिससे कृषि उत्पादन और पर्यावरण दोनों प्रभावित होते हैं। पानी के कटाव से अनाज, तिलहन और दालों के उत्पादन में लगभग 13.4 मिलियन टन की क्षति होती है, जिसकी आर्थिक कीमत करीब 29,200 करोड़ रुपये आंकी गई है। मिट्टी के कटाव से हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये मूल्य के पोषक तत्वों का नुकसान भी होता है।
संस्थान ने पहाड़ी नालों, भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों, खदानों के मलबे, पथरीली भूमि और ढालू क्षेत्रों के सुधार में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। इसके साथ ही वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और जैविक उपचार जैसे क्षेत्रों में भी कई मॉडल विकसित किए गए हैं।
मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में भी संस्थान की विशेष भूमिका रही है।
संस्थान द्वारा “मृदा एवं जल संरक्षण तथा जलसंभर प्रबंधन” विषय पर अब तक 130 प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जा चुके हैं। मार्च 2026 तक 3,218 राजपत्रित अधिकारियों, 5,598 सहायकों तथा 41 विदेशी प्रतिभागियों को प्रशिक्षण दिया गया। इसके अलावा 1,642 लघु पाठ्यक्रमों के माध्यम से 46,223 प्रतिभागियों को लाभान्वित किया गया।
उत्तराखंड में संस्थान द्वारा जलागम विकास, झरना एवं नदी पुनरुद्धार, प्रतिकरात्मक वन रोपण, चारधाम परियोजना, मृदा स्वास्थ्य मिशन और इको-टास्क फोर्स जैसी योजनाओं में तकनीकी सहयोग प्रदान किया जा रहा है।
संस्थान द्वारा विकसित “कलिमाटी मॉडल” के तहत रायपुर ब्लॉक के चार गांवों में 1156 हेक्टेयर बंजर भूमि का सुधार किया गया, जिससे खाद्यान्न उत्पादन में 215 प्रतिशत और किसानों की आय में 115 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई।वहीं “लांघा मॉडल” में विकासनगर ब्लॉक के 321 किसान परिवारों के साथ 423 हेक्टेयर भूमि का उपचार किया गया, जिससे सिंचाई क्षेत्र में 174 प्रतिशत, फसल उत्पादन में 191 प्रतिशत तथा आय में 194 प्रतिशत वृद्धि हुई।
सहस्रधारा क्षेत्र में खदान प्रभावित 64 हेक्टेयर भूमि के उपचार से मिट्टी कटाव 550 टन प्रति हेक्टेयर प्रतिवर्ष से घटकर मात्र 6 टन रह गया। इसके अलावा हटाल-सैंज मॉडल में जल प्रबंधन के माध्यम से किसानों की आय 4.28 गुना बढ़ी और 17 परिवारों का पुनः प्रवासन हुआ।
इस अवसर पर डॉ. बीवी सिंह, डॉ. चरण सिंह, डॉ. बांके बिहारी एवं डॉ. उदय मंडल सहित संस्थान के कई वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अधिकारी उपस्थित रहे।
