लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय पारित करते हुए स्पष्ट किया है कि दहेज के रूप में कीमती वस्तुओं या संपत्ति की सिर्फ मांग से दहेज हत्या का अपराध घटित हुआ नहीं माना जा सकता, जब तक की मृतक महिला पर उत्पीड़न या क्रूरता से जुड़ी घटनाओं की स्पष्ट कड़ियां सिद्ध न हो।
न्यायालय ने कहा कि दहेज मृत्यु के अपराध को सिद्ध करने के लिए मृत्यु और दहेज जनित क्रूरता या हिंसा के बीच ठोस संबंध को सिद्ध करना आवश्यक है। यह निर्णय न्यायमूर्ति मनीष माथुर की एकल पीठ ने मेवा लाल व दो अन्य की अपील पर पारित किया।
लगभग 27 साल पुराने इस मामले में अपीलार्थियों ने सत्र अदालत द्वारा उन्हें सुनाई गई सात वर्ष की सजा और दोषसिद्धि को चुनौती दी थी। मामला राजधानी के बंथरा थाने का है। वर्ष 1999 में अपीलार्थी संख्या दो की पत्नी की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई थी जिसके पश्चात उसके ससुर ने अपीलार्थियों के विरुद्ध दहेज की मांग न पूरी होने पर जहर देकर मृतका की हत्या कर दी।
अपील की सुनवाई में अभियुक्तों की ओर से दलील दी गई कि मृतका के शरीर पर कोई चोट नहीं मिली थी और पोस्टमार्टम की विसरा रिपोर्ट से जहर का कोई प्रमाण नहीं मिला। न्यायालय ने अपने निर्णय में प्राकृतिक मौत और अन्य कारणों से मृत्यु की विवेचना में अंतर स्पष्ट किया।
न्यायालय ने कहा कि यदि मौत सामान्य परिस्थितियों से परे नहीं है लेकिन उसका कारण भी अस्पष्ट है, तो वह दहेज मृत्यु से संबंधित धारा 304-बी आईपीसी के दायरे में नहीं आएगी।
अदालत ने कहा कि साक्ष्य, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चिकित्सक की राय को ध्यान में रखते हुए मौत की अप्राकृतिक परिस्थितियों में हुई मौत साबित नहीं हुई। न्यायालय ने यह भी कहा कि दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के बीच सीधा संबंध होना आवश्यक है, सिर्फ दहेज की मांग या बातचीत पर्याप्त नहीं है।
