यूपी के गोंडा में चल रही राष्ट्र कथा के दूसरे दिन सद्गुरु ऋतेश्वर महाराज ने बच्चों को राष्ट्र के नाम संदेश देते हुए पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह के बारे में कुछ ऐसा कह दिया जिसने उन्हें भावुक कर दिया। उनकी बात सुन बृजभूषण शरण की आंखों में आंसू आ गए। अचानक वह मंच पर ही फूट-फूट कर रोने लगे। कथा के दौरान करीब एक घंटे तक पूर्व सांसद की आंखों में आंसू भरे रहे। वह रोते दिखाई पड़े। ऋतेश्वर महाराज ने बच्चों को संदेश देते हुए बृजभूषण के दबदबे का जिक्र किया था। उन्होंने कहा- ‘इस अवध क्षेत्र में, उत्तर प्रदेश में, भारत में, गोंडा में जब कहते हो ‘दबदबा था, दबदबा है और दबदबा रहेगा’, तो यहां इसका बाप बैठा है, इसका भी दबदबा था, दबदबा है और दबदबा रहेगा।’ ऋतेश्वर महाराज की यह बात सुनते ही बृजभूषण फूट-फूट कर रो पड़े।
राष्ट्र कथा महोत्सव के दूसरे दिन शुक्रवार को सद्गुरु ऋतेश्वर महाराज ने अपनी अमृत वाणी से श्रद्धालुओं को राष्ट्रकथा के गूढ़ रहस्यों से परिचित कराया। उन्होंने आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने के साथ-साथ वर्तमान भारतीय शिक्षा नीति की कमियों पर भी गहन प्रकाश डाला। सद्गुरु महाराज ने कहा कि सच्ची कथा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मन का मंथन है। यह चेतना और ऊर्जा को ऊंचा उठाने में पूर्णतः समर्थ होती है। उन्होंने कहा, जौहरी ही पत्थर की सही पहचान करता है। अज्ञानता जीवन को भारी नुकसान पहुंचाती है। जीवन संघर्ष के लिए नहीं, बल्कि उच्च आदर्शों को अपनाने के लिए मिला है। महाराज ने श्रद्धालुओं को समझाया कि देवताओं की पूजा करने के बजाय उनके आदर्श चरित्र का अनुसरण करना चाहिए। जिसकी पूजा करते हैं, उसका चरित्र भी अपने भीतर उतारना चाहिए। हमने ज्ञान, विज्ञान और प्रज्ञा को मात्र कर्मकांडों तक सीमित कर दिया है। झंडे और डंडे से देश नहीं बचता, बल्कि संस्कारों से बचता है। अतीत में अनेक मंदिरों के साथ हमारे संस्कार भी ध्वस्त हो गए।
कथा महोत्सव के तीसरे दिन शनिवार को सद्गुरु ऋतेश्वर महराज ने युवाओं को राष्ट्र चेतना से जागृत किया। सद्गुरु ने कहा कि सनातन धर्म का मूल ही राष्ट्र की चिंता करना है और यही राष्ट्र कथा महोत्सव का उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि भारत की सनातन संस्कृति में रहने वाले लगभग 140 करोड़ लोग गहरे स्तर पर मानवता, आनंद और कर्तव्य की शिक्षा ग्रहण करते हैं। यह संस्कृति केवल रीति-रिवाज नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक कला है। यदि मनुष्य के भीतर सच्ची मानवता जागृत हो जाए, तो कथा-श्रवण, पूजा-पाठ, गुरु-शिष्य परंपरा सब सार्थक हो उठते हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन में यदि हम पांच इन्द्रियों के पीछे निरंतर भागते रहे। कभी सुख की तलाश में, इच्छाओं की पूर्ति में तो अंत तक कभी चैन नहीं मिलेगा। सनातन दर्शन हमें सिखाता है कि सच्चा सुख बाहर नहीं, भीतर है। आनंद की अवस्था में। उन्होंने कहा कि राष्ट्र की चिंता सनातन परंपरा का मूल है। भगवान राम ने इसी भावना से राजगद्दी त्यागकर वन-गमन किया। कहा कि राम, सीता और लक्ष्मण के वन-प्रस्थान का दृश्य, जो त्याग और राष्ट्र-प्रेम का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि राष्ट्र-निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण ईकाई है युवा पीढ़ी। यदि युवा आनंदित, आह्लादित और ऊर्जावान होगा, तो राष्ट्र स्वाभाविक रूप से समृद्ध और सशक्त बनेगा।
