चंडीगढ़: नायब सरकार मीट की दुकानों और स्लाटर हाउस संचालकों के दोहरे लाइसेंस की व्यवस्था के झंझट को खत्म करने जा रही है। नए प्रावधान लागू होने के बाद मीट कारोबार के लिए नगर निगम या नगरपालिका से अलग ट्रेड लाइसेंस लेने की बाध्यता समाप्त हो जाएगी। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग पहले से ही इन गतिविधियों को नियंत्रित करता है, ऐसे में दोहरे लाइसेंस की व्यवस्था अनावश्यक है।
बृहस्पतिवार को विधानसभा में हरियाणा नगर निगम (संशोधन) विधेयक 2026 और हरियाणा नगरपालिका (संशोधन) विधेयक 2026 पेश किए गए। संशोधित बिल के अनुसार, केंद्र सरकार के मंत्रिमंडलीय सचिवालय के विनियमन प्रकोष्ठ की ओर से दोहरे लाइसेंस की आवश्यकता समाप्त करने के निर्देशों के बाद इस व्यवस्था की समीक्षा की गई और दोहरे लाइसेंस की व्यवस्था को खत्म करने का निर्णय लिया गया।
हरियाणा सरकार द्वारा पेश किए गए संशोधित विधेयकों में हरियाणा नगर निगम व नगरपालिका अधिनियम 1994 की धारा 329 की उपधारा (1) को हटाने का प्रविधान किया गया है। मौजूदा धारा 329 (1) के तहत बिना नगर निगम आयुक्त व नगरपालिका आयुक्त के लाइसेंस के मछली विक्रेता, पोल्ट्री कारोबार अथवा मानव उपभोग के लिए मांस आयात करने का कारोबार करना या मांस, मछली अथवा पोल्ट्री बेचने की जगह संचालित करना प्रतिबंधित है।
इन बिलों में संशोधन का सबसे बड़ा असर यह होगा कि मीट की दुकान या संबंधित कारोबार के लिए नगर निगम व नगरपालिकाओं से अलग ट्रेड लाइसेंस लेने की बाध्यता समाप्त हो जाएगी। इसका मतलब यह नहीं है कि मांस कारोबार पर सभी नियंत्रण खत्म हो जाएंगे। खाद्य एवं औषधि प्रशासन तथा खाद्य सुरक्षा से जुड़े लागू नियमों के तहत आवश्यक लाइसेंस, स्वीकृतियां, निरीक्षण और स्वास्थ्य संबंधी मानकों का पालन करना होगा।
पुराने कानूनों के संदर्भ हटाकर 1925 के उत्तराधिकार कानून को जोड़ेगी सरकार
हरियाणा सरकार ने विधानसभा में हरियाणा न्यायालय (संशोधन) विधेयक 2026 पेश किया। इस विधेयक का उद्देश्य पंजाब न्यायालय अधिनियम 1918 में मौजूद पुराने और अप्रचलित कानूनी प्रविधानों को मौजूदा कानून के अनुरूप करना है।
विधेयक के उद्देश्यों एवं कारणों के विवरण के अनुसार पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल ने राज्य सरकार को इस संबंध में सूचित किया है। पंजाब न्यायालय अधिनियम 1918 की धारा 30 में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1865 और वसीयत एवं प्रशासन अधिनियम 1881 का उल्लेख है। हालांकि बाद में इन दोनों कानूनों को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 ने निरस्त कर दिया था।
सरकार अब धारा 30 की उपधारा (2) के खंड (क) में इन दोनों पुराने कानूनों के स्थान पर ‘भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925’ शब्द रखने का प्रविधान कर रही है। इस संशोधन से कानून में मौजूद पुराने संदर्भ समाप्त होंगे और प्रविधान को वर्तमान में लागू उत्तराधिकार कानून के अनुरूप किया जाएगा।
