चंडीगढ़। हरियाणा के पूर्व उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला अपने काफिले को रोककर सीआईए पुलिस हिसार द्वारा हथियार दिखाने और जान से मारने की धमकी देने के आरोपों को लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट पहुंचे हैं।
शुक्रवार को मामले की सुनवाई के दौरान हरियाणा सरकार की तरफ से जानकारी दी गई कि मामले की जांच जारी है। इस पर कोर्ट ने कोई नोटिस जारी किए बगैर एसपी हिसार को हलफनामा दायर करने का आदेश दिया है।
हाई कोर्ट में दायर याचिका में दुष्यंत ने पूरे मामले में आरोपितों के विरुद्ध न केवल एफआइआर दर्ज कराने की मांग की है, बल्कि जांच को हरियाणा पुलिस से हटाकर किसी स्वतंत्र एजेंसी जैसे सीबीआई या चंडीगढ़ अथवा पंजाब पुलिस को सौंपने का भी अनुरोध किया है। हिसार के पुलिस अधीक्षक द्वारा इस मामले में कार्रवाई नहीं किए जाने के बाद दुष्यंत चौटाला हाई कोर्ट पहुंचे हैं।
उनका आरोप है कि सीआईए पुलिस हिसार की इस कारगुजारी की शिकायत करने के लिए जब उन्होंने पुलिस महानिदेशक अजय सिंघल को फोन किए तो उन्होंने कई बार घंटी जाने के बाद उनके फोन को ब्लॉक कर दिया। दुष्यंत चौटाला का काफिला रोकने व सीआईए हिसार पुलिस द्वारा जान से मारने की धमकी से जुड़े इस प्रकरण की राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर कड़ी आलोचना की जा रही है।
17 अप्रैल को क्या हुआ था?
दुष्यंत चौटाला की ओर से हाई कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया कि 17 अप्रैल को हिसार में उनके काफिले को एक सफेद बोलेरो वाहन ने रोक लिया।
सिविल ड्रेस में मौजूद पुलिस अधिकारी, जिनमें इंस्पेक्टर पवन कुमार का नाम प्रमुख रूप से शामिल है, उसने हथियार लहराते हुए उन्हें और उनके सुरक्षाकर्मियों को धमकाया। दुष्यंत चौटाला ने कोर्ट को बताया कि वे वाई-प्लस सुरक्षा श्रेणी के तहत संरक्षित हैं, बावजूद इसके इस तरह की घटना होना बेहद गंभीर है।
याचिका के अनुसार, उनके पर्सनल सिक्योरिटी ऑफिसर्स ने भी इस घटना की पुष्टि करते हुए अलग-अलग शिकायतें दी हैं, जिनमें जान से मारने की धमकी तक का जिक्र है।
इस घटना के बाद हरियाणा पुलिस ने निष्पक्ष कार्रवाई करने की बजाय उल्टा उनके परिजनों और समर्थकों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज कर दबाव बनाने की कोशिश की।
दुष्यंत ने कोर्ट के समक्ष रखी दलील
खासतौर पर सात अप्रैल की एक घटना को आधार बनाकर दर्ज एफआईआर को प्रतिशोधात्मक कार्रवाई बताया गया है। दुष्यंत चौटाला ने कोर्ट के समक्ष यह भी दलील दी कि घटना के बावजूद पुलिस ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की और न ही एफआईआर दर्ज की गई।
इसके विपरीत, मामले को दबाने और साक्ष्यों को प्रभावित करने की आशंका जताई गई है। याचिका में सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने और सभी संबंधित रिकॉर्ड संरक्षित करने के निर्देश देने की मांग भी की गई है।
