चंडीगढ़। हरियाणा में हुए करीब 750 करोड़ रुपये के दो बैंक घोटालों के बाद राज्य सरकार अलर्ट मोड पर है। 590 करोड़ रुपये के आइडीएफसी बैंक घोटाले की जांच सरकार जहां सीबीआइ को सौंप चुकी है, वहीं प्रशासनिक तंत्र को भी सचेत कर दिया गया है।
सरकार के पास रिपोर्ट है कि अधिकारियों ने निजी बैंकों से व्यक्तिगत लाभ उठाने के चक्कर में सरकारी पैसे का दुरुपयोग किया। सरकारी पैसे को निजी बैंकों में जमा कराया गया, जिसके बाद बैंक अधिकारियों ने इन्हीं प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी पैसे को इधर से उधर घुमाया।
हरियाणा सरकार ने अब अधिकारियों को निजी व्यक्तियों से संपर्क और व्यवहार को लेकर खुद की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने के निर्देश दिए हैं।
मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी के निर्देश पर मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी ने कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए व्यक्तिगत और प्रशासनिक स्तर पर सुरक्षा प्रोटोकाल जरूरी हैं। अधिकारियों के लिए एसओपी बनाने का कदम केवल एक घोटाले की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि नौकरशाही के कामकाज के तरीके में व्यवहारिक सतर्कता लाने की कोशिश है।
प्रस्तावित नई एसओपी के तहत अधिकारियों को अब रिकार्ड में किसी निजी व्यक्ति या संस्था से पहली मुलाकात का संक्षिप्त विवरण दर्ज करना होगा। आवश्यक हो तो ईमेल-आफिशियल चैनल के माध्यम से ही संवाद किया जा सकेगा। अज्ञात नंबर से आए काल या मैंसेज की सत्यता की पहचान करनी होगी।
प्रस्तावित एसओपी के अनुसार, संवेदनशील जानकारी केवल आधिकारिक माध्यम से साझा की जाएगी। मौखिक सिफारिश की बजाय लिखित या आधिकारिक आदेश की मांग की जाएगी। कोई भी निर्णय करने से पहले संबंधित नियम और फाइल नोटिंग की अनिवार्यता का पालन करना होगा।
किस प्रकार के बाहरी संपर्क ज्यादा जोखिम वाले हैं, इसका आकलन करना होगा। नियमित अंतराल पर कर्मचारियों को जागरूकता प्रशिक्षण देना अनिवार्य होगा। किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों या सतर्कता विभाग को सूचना दी जाएगी।
आइएएस अधिकारियों से कहा गया है कि वे किसी अज्ञात या संदिग्ध व्यक्ति के साथ फोटो न खिंचवाएं। ऐसी तस्वीरों का दुरुपयोग ‘निकटता’ दिखाने के लिए किया जा सकता है। बिना सत्यापन के निमंत्रण या उपहार स्वीकार न करें। निजी कार्यक्रमों या उपहारों को स्वीकार करने से हितों का टकराव बन सकता है।
अनौपचारिक सिफारिशों पर तुरंत कार्रवाई न करें। केवल ‘ऊपर से कहा गया है’ जैसे मौखिक निर्देशों के आधार पर निर्णय न लें। व्यक्तिगत मोबाइल या इंटरनेट मीडिया पर संवेदनशील चर्चा न करें। आधिकारिक मामलों के लिए केवल सरकारी चैनल का उपयोग करें। जरूरत पड़ने पर ‘ना’ कहना भी प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा माना जाएगा।
