पंजाब की अकाली राजनीति में नए विकल्प के तौर पर उभरा अकाली दल पुनर सुरजीत गठन के महज एक साल के भीतर ही बिखराव की स्थिति में पहुंच गया है। 11 अगस्त 2025 को ज्ञानी हरप्रीत सिंह की अगुवाई में गठित इस संगठन से अब एक-एक कर दिग्गज नेता किनारा कर रहे हैं।
कभी पूर्व सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा, पूर्व मंत्री सुखदेव सिंह ढींडसा के बेटे परमिंदर सिंह ढींडसा, मनप्रीत सिंह अयाली, सुरजीत सिंह रखड़ा, गुरप्रताप सिंह वड़ाला और इकबाल सिंह झुंदा जैसे नेताओं की मौजूदगी से मजबूत दिखने वाले इस संगठन के सामने अब अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की चुनौती है।
गठन के बाद से ही शुरू हुआ था बिखराव
संगठन से नेताओं के अलग होने का सिलसिला गठन के कुछ समय बाद ही शुरू हो गया था। सबसे पहले चरणजीत सिंह बराड़ ने संगठन से दूरी बनाकर भाजपा का दामन थाम लिया। इसके बाद 4 अप्रैल 2026 को पूर्व मंत्री जत्थेदार तोता सिंह के बेटे बरजिंदर सिंह उर्फ मखन बराड़ ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और सभी पदों से इस्तीफा दे दिया। अप्रैल में ही वह सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल में लौट गए।
मई 2026 में पूर्व कैबिनेट मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में संगठन से निष्कासित कर दिया गया। 16 मई को उन्होंने मुख्यमंत्री भगवंत मान की मौजूदगी में आम आदमी पार्टी का दामन थाम लिया। इसी दौरान दाखा से विधायक मनप्रीत सिंह अयाली ने भी संगठन से दूरी बना ली। 20 मई को उन्होंने पुनर सुरजीत के सभी पदों और समन्वय समिति के संयोजक पद से इस्तीफा दे दिया। 9 जून को वह अमृतपाल सिंह के नेतृत्व वाले अकाली दल वारिस पंजाब दे में शामिल हो गए।
नेतृत्व से मतभेद वजह
अयाली के साथ जुड़े पूर्व विधायक इकबाल सिंह झुंदा ने भी जुलाई 2026 में संगठन से अलग होकर अपने समर्थकों के साथ वारिस पंजाब दे को समर्थन देने का एलान किया। अब 4 नवंबर 2026 को पूर्व सांसद प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने भी ज्ञानी हरप्रीत सिंह के नेतृत्व वाले अकाली दल पुनर सुरजीत से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने पंथक एकता के मुद्दे पर नेतृत्व से मतभेदों को इसकी वजह बताया। वह सभी अकाली और पंथक संगठनों को एक मंच पर लाने के पक्षधर थे, लेकिन इस पर सहमति नहीं बन पाई।
दरअसल, संगठन के गठन के समय इसे अकाली राजनीति में नए विकल्प और सुधार की मुहिम के तौर पर पेश किया गया था। इसका उद्देश्य पुराने सिद्धांतों और पंथक संस्थाओं की गरिमा के अनुरूप अकाली दल को दोबारा खड़ा करना बताया गया था। हालांकि नेतृत्व, राजनीतिक रणनीति, दूसरे पंथक संगठनों के साथ तालमेल और चुनावी रास्ते को लेकर मतभेद लगातार सामने आते रहे। वारिस पंजाब दे के साथ गठबंधन की कोशिश भी संगठन को एकजुट नहीं रख सकी।
अब स्थिति यह है कि सुरजीत सिंह रखड़ा आम आदमी पार्टी, चरणजीत सिंह बराड़ भाजपा, मनप्रीत सिंह अयाली और इकबाल सिंह झुंदा वारिस पंजाब दे के साथ हैं, जबकि मखन बराड़ और प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा की वापसी पुराने अकाली दल की ओर हो रही है।
अकाली राजनीति में बिखराव का पुराना इतिहास
शिरोमणि अकाली दल में बिखराव और एकजुटता का यह पहला दौर नहीं है। 14 दिसंबर 1920 को गठित पार्टी अपने 106 साल के इतिहास में कई बार विभाजन और एकजुटता के दौर से गुजर चुकी है। ऐसे में अकाली दल पुनर सुरजीत के भीतर मौजूदा टूट को भी पंजाब की अकाली राजनीति के इसी उतार-चढ़ाव के एक नए अध्याय के तौर पर देखा जा रहा है।
