शिमला: हिमाचल की राजधानी शिमला सहित प्रदेश के अन्य शहरी क्षेत्रों में भवनों के कुछ हिस्सों के नियमितीकरण और कमर्शियल बिजली-पानी के भारी-भरकम बिलों की समस्या से जूझ रहे हजारों लोगों को राहत दिलाने के लिए नगर निगम शिमला के पार्षदों ने महापौर सुरेंद्र चौहान की अध्यक्षता में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से मुलाकात की. इस दौरान पंचायतीराज मंत्री अनिरुद्ध सिंह भी मौजूद रहे.
कैबिनेट मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने मुख्यमंत्री से कहा कि सरकार ने एटिक और पार्किंग से संबंधित मामलों में लोगों को राहत देने के लिए कदम उठाए हैं. लेकिन अभी भी कई ऐसी जगहें हैं, जहां वाहन पार्क करने की सुविधा उपलब्ध नहीं है. ऐसे भवनों के बेसमेंट अभी तक नियमित नहीं हो पाए हैं. जिन लोगों के भवनों में पार्किंग की व्यवस्था संभव नहीं है, उनके बेसमेंट से जुड़े मामलों का भी समाधान निकाला जाना चाहिए.
निरुद्ध सिंह ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि ऐसी वन टाइम सेटलमेंट पॉलिसी लाई जाए, जिससे इन भवनों के मालिकों को राहत मिल सके और लंबे समय से चली आ रही समस्या का समाधान हो. भवनों में व्यावसायिक गतिविधियां होने के कारण कई लोगों को बिजली और पानी के कमर्शियल बिल चुकाने पड़ते हैं. इससे आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है. कई बार ऐसी परिस्थितियों में लोगों को काफी महंगे बिलों का भुगतान करना पड़ता है.
उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि बेसमेंट को नियमित करने और मिक्स्ड लैंड यूज के दोनों मामलों पर अलग-अलग पहल की जाए. इससे न केवल भवन मालिकों को राहत मिलेगी, बल्कि शहर में लंबे समय से चली आ रही इन समस्याओं का भी समाधान हो सकेगा. मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने मुख्यमंत्री से कहा कि इन दोनों विषयों को एक बार गंभीरता से देखा जाए और जनहित में ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिसका लाभ शिमला के साथ-साथ प्रदेश के अन्य क्षेत्रों के लोगों को भी मिल सके.
नगर निगम शिमला के महापौर सुरेंद्र चौहान ने बताया कि नगर निगम की बैठक के दौरान उन्हें मंत्री की ओर से संदेश मिला था कि सरकार वन टाइम सेटलमेंट पॉलिसी लाने की दिशा में काम करना चाहती है. इसके बाद उन्होंने सदन में इस विषय को उठाया और सभी पार्षदों से लोगों की इस समस्या को सरकार के समक्ष रखने के लिए साथ आने का आग्रह किया.
शिमला महापौर सुरेंद्र चौहान ने कहा, “यह समस्या केवल शिमला शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि शिमला के आसपास के क्षेत्रों सहित प्रदेश के कई शहरी इलाकों में हजारों लोग इससे प्रभावित हैं. भवनों के कुछ हिस्सों के नियमितीकरण से जुड़ी समस्याओं के कारण लोगों को बिजली और पानी के कनेक्शन पर कमर्शियल दरों से बिल चुकाने पड़ रहे हैं. इससे आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है. वन टाइम सेटलमेंट पॉलिसी लागू होने से ऐसे लोगों को बड़ी राहत मिल सकती है”.
सुरेंद्र चौहान ने बताया कि मुख्यमंत्री ने उन्हें आश्वासन दिया है कि सरकार पहले ही एटिक को नियमित करने की दिशा में कदम उठा चुकी है और इसकी ऊंचाई से संबंधित प्रावधानों में भी बदलाव किया गया है. अब सरकार बेसमेंट को लेकर भी राहत देने की दिशा में आगे बढ़ रही है. उन्होंने बताया कि ऐसे बेसमेंट, जहां पार्किंग की सुविधा उपलब्ध करवाई जा सकती है और वाहन आसानी से पहुंच सकते हैं, उन्हें खोलने की अनुमति देने के लिए सरकार की ओर से नोटिफिकेशन जारी करने की बात कही गई है.
कमर्शियल बिजली-पानी के बिलों से मिलेगी राहत
महापौर सुरेंद्र चौहान ने कहा कि इस पूरी मांग का मुख्य उद्देश्य लोगों को कमर्शियल बिजली और पानी के भारी-भरकम बिलों से राहत दिलाना है. कई लोगों को भवनों से संबंधित नियमों और नियमितीकरण की स्थिति के कारण सामान्य घरेलू दरों के बजाय कमर्शियल दरों पर बिल चुकाने पड़ रहे हैं. इससे उनके खर्च में काफी बढ़ोतरी हो रही है.
उन्होंने कहा कि यदि सरकार वन टाइम सेटलमेंट पॉलिसी लाती है तो हजारों परिवारों को इसका सीधा लाभ मिलेगा. यह किसी एक शहर या क्षेत्र का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश के लोगों से जुड़ी समस्या है. मुख्यमंत्री ने भी इस मांग पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है और पूरे हिमाचल प्रदेश के लिए नीति बनाने का भरोसा दिया है.
महापौर ने विपक्षी पार्षदों के नहीं पहुंचने पर जताई हैरानी
महापौर ने इस मुद्दे को गैर-राजनीतिक बताते हुए कहा कि इसका किसी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है. यह आम लोगों की समस्या है. इससे कांग्रेस और भाजपा दोनों विचारधाराओं से जुड़े लोगों के भवन और परिवार प्रभावित हैं. उन्हें उम्मीद थी कि सभी पार्षद इस जनहित के मुद्दे पर एकजुट होकर मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचेंगे. सदन में भी सभी पार्षदों से साथ चलने का आग्रह किया था, ताकि सरकार के सामने सामूहिक रूप से लोगों की समस्याएं रखी जा सकें.
सुरेंद्र चौहान ने कहा कि यह किसी की बिल्डिंग को पास करवाने या किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने का मामला नहीं है. सभी पार्षदों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों के लोगों की समस्याओं को उठाएं और उनके समाधान के लिए सरकार के साथ खड़े हों.
