लखनऊ। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव तीन माह में कराने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ गई है। विधान सभा चुनाव से ठीक पहले पंचायत चुनाव कराने के संभावित नफा-नुकसान के आकलन किए जा रहे हैं।
पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर का कहना है कि सरकार अभी आदेश का अध्ययन कर रही है। हालांकि, माना यही जा रहा है कि सरकार हाई कोर्ट के निर्णर्य के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जा सकती है।
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने की तिथि 26 मई से पहले पंचायत चुनाव नहीं करा पाने पर सरकार ने पंचायतों में प्रशासक नियुक्त किए हैं। हाई कोर्ट के आदेश के बाद सरकार को अब अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। सूत्र बताते हैं कि सरकार अभी से प्रयास करे तो शायद तीन माह में चुनाव करा ले जाए।
राज्य निर्वाचन आयोग को चाहिए 45 दिन
ऐसी स्थिति में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के लिए गठित समर्पित अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को तत्काल अपनी रिपोर्ट देनी पड़ेगी। इस रिपोर्ट मिलने पर सीटों का आरक्षण तय करने में करीब एक माह लगेगा। चुनाव कराने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग को भी 45 दिन चाहिए।
मंत्री राजभर ने कहा कि सरकार हाई कोर्ट के निर्णय का सम्मान करती है। हाई कोर्ट के आदेश और संवैधानिक प्रविधानों का अध्ययन करते हुए निर्णय लिया जाएगा। पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष राम औतार सिंह ने कहा कि आयोग 20 नवंबर तक अपनी रिपोर्ट देने का प्रयास करेगा। हाई कोर्ट ने आयोग के लिए क्या कहा है, इसका अध्ययन किया जाएगा।
गौरतलब है कि सरकार ने 20 मई को आयोग का गठन करते हुए रिपोर्ट के लिए छह माह का समय निर्धारित किया था। आयोग की टीम अब तक 75 में से 42 जिलों में ही जा सकी है।
राज्य निर्वाचन आयोग ने 10 जून को पंचायत चुनाव के लिए मतदाता सूची प्रकाशित की थी, जिसमें 12.58 करोड़ मतदाता शामिल हैं। नए परिसीमन के तहत प्रदेश की 57,654 ग्राम पंचायतों, 826 क्षेत्र पंचायतों और 75 जिला पंचायतों के चुनाव कराए जाने हैं।
ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई, जिला पंचायतों का कार्यकाल 11 जुलाई और क्षेत्र पंचायतों का कार्यकाल 19 जुलाई को समाप्त हुआ था।
