देहरादून। राजकीय कार्यक्रमों की औपचारिकता, व्यस्त कार्यक्रम और प्रोटोकाल के बीच कुछ पल ऐसे भी होते हैं, जो पूरे आयोजन की सबसे खूबसूरत याद बन जाते हैं। देहरादून स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (आइजीएनएफए) में प्रशिक्षु आइएफएस अधिकारियों को संबोधित करने के कार्यक्रम में बुधवार को भी ऐसा ही एक भावुक और आत्मीय क्षण देखने को मिला, जब उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने प्रोटोकाल से आगे बढ़कर इंसानी संवेदना को महत्व दिया।
संबोधन कार्यक्रम समाप्त होने के बाद शाम करीब पांच बजे प्रशिक्षु भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारियों और अकादमी के फैकल्टी सदस्यों के साथ उपराष्ट्रपति की ग्रुप फोटो प्रस्तावित थी। इसी बीच बारिश शुरू हो गई। उपराष्ट्रपति का कार्यक्रम पहले से ही बेहद व्यस्त था, लिहाजा वर्षा के कारण ग्रुप फोटो का कार्यक्रम टालने पर विचार हुआ।
लेकिन उपराष्ट्रपति ने खुद कहा कि ग्रुप फोटो केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि जीवनभर याद रहने वाला क्षण होता है। इसे टाला नहीं जाना चाहिए। इसके बाद तय हुआ कि खुले में फोटो लेने के बजाय आडिटोरियम में यह यादगार पल दर्ज किया जाएगा।
प्रशिक्षु आइएफएस अधिकारियों, अन्य प्रशिक्षणार्थियों और फैकल्टी सदस्यों को मिलाकर करीब 200 लोग थे। सभी के साथ एक साथ फोटो लेना संभव नहीं था, इसलिए अलग-अलग बैच में फोटो खिंचवाने का सिलसिला शुरू हुआ। उपराष्ट्रपति ने करीब आधे घंटे तक धैर्यपूर्वक सभी के साथ तस्वीरें खिंचवाईं।
लेकिन इस पूरे सिलसिले में एक तस्वीर ऐसी बनी, जिसने कार्यक्रम की बाकी तस्वीरों को पीछे छोड़ दिया।
फोटो सेशन के दौरान उपराष्ट्रपति की नजर मंच के नीचे व्हीलचेयर पर बैठे एक व्यक्ति पर पड़ी। वह मंच पर नहीं आ सके थे। उपराष्ट्रपति ने उनके बारे में पूछा तो पता चला कि वह आइजीएनएफए के अपर प्रोफेसर प्रशांत ढांडा हैं। कुछ वर्ष पहले एक दुर्घटना के बाद से वह खड़े होने में असमर्थ हैं।
इतना सुनते ही उपराष्ट्रपति ने बिना किसी औपचारिकता के खुद मंच से नीचे उतरने का फैसला किया। वह व्हीलचेयर पर बैठे प्रशांत ढांडा के पास पहुंचे और उनके साथ अलग से फोटो खिंचवाई।
यह महज एक तस्वीर नहीं थी। यह उस संवेदनशीलता की तस्वीर थी, जिसमें पद की ऊंचाई से कहीं ज्यादा महत्व इंसान को दिया गया। करीब 200 लोगों के साथ खिंचवाई गई तस्वीरों के बीच शायद यही तस्वीर सबसे ज्यादा याद की जाएगी। क्योंकि इसमें कैमरे के सामने सिर्फ दो व्यक्ति नहीं थे, बल्कि सम्मान, संवेदना और आत्मीयता का एक बेहद खूबसूरत भाव दर्ज हुआ।
उपराष्ट्रपति का यह सहज व्यवहार वहां मौजूद लोगों के लिए भी भावुक कर देने वाला क्षण बन गया। कभी-कभी किसी बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान उसका पद नहीं, बल्कि उसका सरल हृदय होता है।
