लखनऊ। पश्चिम बंगाल में पहली बार सरकार बनाने में सफल भारतीय जनता पार्टी अब उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के प्रयास में लग गई है। योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल के विस्तार में मंत्रियों के चयन से भाजपा ने अपनी सधी चाल का संकेत भी दे दिया है।
भारतीय जनता पार्टी अगले वर्ष उत्तर प्रदश में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए महिला और अत्यंत पिछड़े वर्ग के वोट बैंक को मजबूत करने पर जोर दे रही है। पार्टी ने उत्तर प्रदेश में सामाजिक समीकरणों को फिर से साधा है। यहीं से सर्वाधिक लोकसभा सदस्य चुने जाते हैं। योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल के विस्तार में भाजपा ने ब्राह्मण, जाट, गुर्जर, लोध, पासवान और अत्यंत पिछड़े जाति समूहों को प्रतिनिधित्व दिया है।
योगी आदित्यनाथ सरकार के विधानसभा चुनावों से पहले आखिरी कैबिनेट विस्तार में भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन्द्र सिंह चौधरी और समाजवादी पार्टी के बागी मनोज पाण्डेय को कैबिनेट मंत्री बनाया है। राज्य मंत्री अजीत पाल सिंह और सोमेंद्र तोमर को पदोन्नत करके स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया है। इसके साथ चार नए राज्य मंत्रियों कृष्णा पासवान, सुरेंद्र दिलेर, हंसराज विश्वकर्मा और कैलाश राजपूत को भी शपथ दिलाई गई है।
नाराज को मनाने की कोशिश
योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल विस्तार के साथ भाजपा ने उत्तर प्रदेश में नाराज जातियों और पाला बदलने वाले नेताओं को मनाने की कोशिश की है। इसमें क्षेत्रीय संतुलन बनाने का भी प्रयास किया है। पार्टी ने कैबिनेट विस्तार के माध्यम से कई वोट बैंकों तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश की है। उसने मनोज पाण्डेय को कैबिनेट मंत्री बनाकर ब्राह्मण वोट बैंक को खुश करने की कोशिश की है। भाजपा शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि पाण्डेय और उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक को कैबिनेट में रखने से बड़े ब्राह्मण समुदाय को सही संदेश जाता है। यूजीसी गाइडलाइंस के मुद्दों पर ब्राह्मण समुदाय ही सबसे अधिक मुखर है और माना जा रहा है कि यह समाज भाजपा से नाराज है।
पिछड़े और अति-पिछड़े समूहों पर भी जोर
भाजपा ने इसी प्रकार भूपेन्द्र सिंह चौधरी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट प्रतिनिधि, सोमेंद्र तोमर को गुर्जरों के नेता, कृष्णा पासवान को दलित-पासी समुदाय और सुरेंद्र दिलेर को वाल्मीकि समुदाय को साधने के लिए मंत्री बनाया है। हंसराज विश्वकर्मा और कैलाश राजपूत को मंत्रिमंडल में जगह देकर विश्वकर्मा व लोध जैसे पिछड़े और अति-पिछड़े समूहों पर भी जोर दिया है। इस ताजा विस्तार का व्यापक संदेश यह है कि भाजपा अब गैर-यादव ओबीसी के इर्द-गिर्द घूमने वाली राजनीति से आगे बढ़ गई है और अब छोटे-छोटे सामाजिक समूहों पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
स्थिर नहीं थे 2024 में जाटों के समीकरण
पार्टी उन क्षेत्रों में अपनी कमियों को दूर कर रही है, जहां 2024 के लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2024 में जाटों के समीकरण स्थिर नहीं थे। दलित वोटों का बड़ा हिस्सा मायावती के विकल्प के तौर पर अखिलेश यादव की तरफ चला गया, जिन्होंने अपने पीडीए के नारे के माध्यम से अति-पिछड़े समूहों को अपनी तरफ आकर्षित किया था। इस विस्तार से भाजपा उत्तर प्रदेश में इन मुद्दों को सुलझाने की कोशिश कर रही है।
पुराने मंत्रियों को हटाया नहीं
पार्टी ने पुराने मंत्रियों को हटाया नहीं है, क्योंकि वह किसी भी तरह की नाराज़गी या गुटबाजी को बढ़ावा नहीं देना चाहती। अभी तो पंचायत चुनावों को टाल दिया गया था, क्योंकि पार्टी नहीं चाहती थी कि गुटबाज़ी की वजह से उसे 2027 के चुनावों में कोई नुकसान पहुंचे।
दूसरी पार्टियों से आए नेताओं को शामिल करके, पार्टी ने उन अन्य पार्टियों के नेताओं को भी एक संदेश दिया है जो पाला बदलने की सोच रहे हैं। मंत्रियों की संख्या में यह विस्तार सिर्फ 2027 में सत्ता हासिल करने की एक अहम चाबी भी माना जा रहा है।
