कुल्लू: भारत के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बुधवार को अपने दौरे के दूसरे दिन मनाली के माता हिडिंबा के मंदिर पहुंची. इस दौरान राज्यपाल कवींद्र गुप्ता, मंडी की सांसद कंगना रनौत और अन्य अधिकारी भी उपस्थित रहे. इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने माता हिडिंबा के दर्शन किए और मंदिर के इतिहास के बारे में भी जानकारी ली. राष्ट्रपति के दौरे के चलते पूरे इलाके में कड़ी सुरक्षा तैनात की गई और जगह जगह पर पुलिस के जवान भी तैनात रहे.
वहीं, राष्ट्रपति के दौरे को लेकर पूरी सड़क पर वाहनों की आवाजाही को रोक दिया गया था. माता हिडिंबा के दर्शन करने के बाद राष्ट्रपति जिला प्रशासन के अधिकारियों के साथ मनाली के माल रोड पहुंची. इस दौरान उन्होंने मनाली माल रोड का भी दौरा किया. मनाली माल रोड के दौरे को देखते हुए यहां पर भी सुरक्षा व्यवस्था को तैनात किया गया था और दौरे से थोड़ी देर पहले ही माल रोड को भी खाली किया गया था. ऐसे में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के दौरे को लेकर सुरक्षा व्यवस्था भी काफी चौकस नजर आई.
इस दौरान उनके काफिले के गुजरने के दौरान मालरोड समेत कई स्थानों पर लोग सड़क किनारे खड़े होकर राष्ट्रपति की एक झलक पाने के लिए खड़े रहे. माल रोड पर राष्ट्रपति राष्ट्रपति के प्रवास को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से ड्रोन, पैराग्लाइडर और अन्य हवाई गतिविधियों पर प्रतिबंध भी लगाया है. जिला कुल्लू प्रशासन की ओर से भी पांच से आठ अक्तूबर तक निर्धारित क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी प्रतिबंध लागू किए गए हैं.
क्यों खास है माता हिडिंबा मंदिर?
पर्यटन नगरी मनाली के मनाली गांव में स्थित माता हिडिंबा का प्राचीन मंदिर अपनी विशिष्ट वास्तुकला और धार्मिक महत्व के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है. यह मंदिर चार छतों वाली पगोडा शैली में विशालकाय देवदार वृक्षों के बीच बना है. इसका संबंध महाभारत से जोड़ा जाता है. पांडव पुत्र भीम की पत्नी हिडिंबा को समर्पित इस मंदिर में माता को कुल्लू के ‘राज परिवार की दादी’ का विशेष दर्जा प्राप्त है.
भीम और हिडिंब के बीच हुआ था युद्ध
आचार्य विजय कुमार ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में जब पांडव अज्ञातवास के दौरान जंगलों में भटक रहे थे, तब राक्षस हिडिंब ने अपनी बहन हिडिंबा को भोजन की तलाश के लिए भेजा था. हिडिंबा ने जब पांचों पांडवों और माता कुंती को देखा, तो भीम से उसका प्रेम हो गया. उसने पांडवों को नुकसान नहीं पहुंचाया, जिससे क्रोधित होकर हिडिंब ने पांडवों पर हमला कर दिया. भीषण युद्ध के दौरान भीम ने हिडिंब का वध कर दिया. पश्चात, माता कुंती की आज्ञा से भीम और हिडिंबा का विवाह हुआ, जिनसे घटोत्कच नामक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ. घटोत्कच ने महाभारत के युद्ध में वीरता का परिचय दिया था.
आचार्य विजय कुमार के मुताबिक भीम से विवाह के उपरांत हिडिंबा मानवी रूप परिवर्तित हुई और कालांतर में देवी के रूप में पूजित हुईं. मनाली में ही उनका दैवीकरण हुआ. मंदिर के भीतर एक प्राकृतिक चट्टान है. इसे माता का देव स्थान माना जाता है. इस चट्टान को स्थानीय भाषा में ‘ढूंग’ कहा जाता है, इसी कारण इन्हें ‘ढूंगरी देवी’ या क्षेत्र की ग्राम देवी के रूप में पूजा जाता है.
बहादुर सिंह ने करवाया था मंदिर का निर्माण
माता के पुजारी राकेश शर्मा के अनुसार, इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण कुल्लू के शासक बहादुर सिंह (1546–1569 ई.) के शासनकाल में वर्ष 1553 में करवाया गया था. मंदिर की दीवारें पारंपरिक पहाड़ी शैली की हैं और इसका प्रवेश द्वार उत्कृष्ट कास्ट (कठ) नक्काशी का बेहतरीन नमूना है. कुल्लू के प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव में भी माता हिडिंबा की मुख्य भूमिका होती है, जब तक उत्सव में माता का आगमन नहीं होता, तब तक रथ यात्रा की कोई भी आधिकारिक तैयारी शुरू नहीं की जाती है.
