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Home » Blog » पद्मश्री पाकर इन 10 विभूतियों ने चमकाया यूपी का नाम, एक को मिला पद्मभूषण, जानें इनका योगदान
उत्तर प्रदेशराज्य

पद्मश्री पाकर इन 10 विभूतियों ने चमकाया यूपी का नाम, एक को मिला पद्मभूषण, जानें इनका योगदान

lokmatujala
Last updated: January 26, 2026 2:42 am
By lokmatujala
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12 Min Read
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लखनऊ : गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कार 2026 की घोषणा की गई है. यूपी को एक पद्म विभूषण और 10 पद्मश्री पुरस्कारों की घोषणा की गई है. एन राजम को कला के लिए पद्म विभूषण दिया गया है. वायलिन वादक एन राजम ने 75 साल के करियर में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत को वैश्विक बनाया. गायकी अंग गायन शैली की शुरुआत की और ख्याल गायकी अंग की शुरुआत की.

इन्हें मिला पद्म श्री :

  • पूर्व प्रोफेसर मंगला कपूर
  • प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल
  • डॉ. राजेंद्र प्रसाद
  • डॉ. केवल किशन ठकराल
  • अनिल रस्तोगी
  • अशोक कुमार सिंह
  • बुद्ध रश्मी मणि
  • चिरंजी लाल यादव
  • रघुपति सिंह (मरणोपरांत)
  • प्रवीण कुमार

प्रो. मंगला को सीएम ने किया था सम्मानित : BHU में संगीत विभाग की पूर्व प्रोफेसर मंगला कपूर को संगीत के क्षेत्र में काम करने पर सम्मान मिला है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संगीत के क्षेत्र में बेहतर पहल करने के लिए सम्मानित किया था.

प्रोफेसर कपूर के जीवन पर बनी है मराठी फिल्म मंगला : पूर्व प्रोफेसर मंगला कपूर ने कहा, मुझे इस सम्मान के काबिल समझने के लिए सभी का धन्यवाद. मंगला कपूर शास्त्रीय संगीत की शिक्षिका के रूप में जानी जाती हैं. संगीत में विशेष योगदान के लिए उन्हें साल 1982 में तरंग संस्थान की ओर से ‘काशी की लता’ और राज्यसभा की ओर से ‘रोल मॉडल’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. उनके जीवन पर आधारित एक मराठी फिल्म मंगला भी बनाई जा चुकी है.

12 साल की उम्र में हुआ था तेजाब से हमला : मंगला कपूर बताती हैं, मैं 12 साल की उम्र की थी, तब मुझपर तेजाब से हमला किया गया था. व्यापार की रंजिश के चलते मेरे घर के ही नौकर ने मुझपर तेजाब फिंकवाया था. जब भी यह घटना मुझे याद आती है आंखों में आंसू आ जाते हैं. इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी, फिर भी न जाने किस बात की सजा मुझे मिली थी.

मंगला कपूर बताती हैं, उस हादसे के बाद मेरा जीवन बदल सा गया था. न किसी से मिलने का मन होता न बात करने का. एक कमरे में जीवन बीतने लगा था. फिर पिताजी ने मुझे जिंदगी को आगे बढ़ाने की हिम्मत दी. मैंने संगीत में ही ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन और फिर पीएचडी की डिग्री हासिल की. पढ़ाई के लिए संघर्ष करना पड़ा था.

30 साल तक विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा दी : घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ चुकी थी. कॉलेज पढ़ने के लिए पैदल ही जाना पड़ता था. लोग मेरा मजाक भी बनाते थे, लेकिन माता-पिता ने मेरा साथ दिया, तो हिम्मत बनी हुई थी. कॉलेज में पढ़ाई के दौरान एक बार लोगों ने मुझे मंदिर में भजन गाते हुए सुना था. मेरी आवाज लोगों को बहुत पसंद आई, जिसके बाद मुझे स्टेज पर परफॉर्म करने के मौके मिलते रहे.

समय बीतने के साथ, साल 1989 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू कर दिया. 30 साल तक यहां विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा दी. इस दौरान ऐसे कई मौके मिले, जिससे लोगों के बीच मेरी आवाज पहुंची. लोग मुझे मेरी आवाज से भी पहचानते थे.

कालाजार के इलाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया : काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (IMS) के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल ने कालाजार के इलाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. प्रो. श्याम सुंदर को कालाजार के लिए प्रभावी तकनीक विकसित करने के लिए राष्ट्रपति की ओर से ‘विजिटर पुरस्कार’ और ‘डाॅ. पीएन राजू ओरेशन’ सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है.

उन्होंने भारतीय कालाजार के उपचार में लिपिड संबंधित एम्फोटेरीसिन-बी पर सराहनीय काम किया. लिपोसोमल एम्फोटेरीसिन-बी एक बड़ी सफलता के रूप में माना जाता है. यह एकल खुराक विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से मान्यता प्राप्त है. इसका उपयोग कालाजार नियंत्रक कार्यक्रम में भारत में होता है.

मल्टी ड्रग थेरेपी का सर्वप्रथम सफल परीक्षण किया : प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल ने कालाजार के इलाज में मल्टी ड्रग थेरेपी का सर्वप्रथम सफल परीक्षण किया, जिसे WHO ने अनुमोदित किया था. उन्होंने कालाजार के इलाज के लिए पहली बार प्रभावी दवा मिल्टेफोसीन भी विकसित की है. यह भारत, नेपाल और बांग्लादेश में ‘कालाजार उन्मूलन कार्यक्रम’ के लिए इस्तेमाल किया गया था. यह दवा दुनिया भर में प्रयोग में लाई जा रही है. उन्होंने सबसे पहले आरके-39 स्ट्रीप जांच का परीक्षण किया था. प्रोफेसर श्याम सुंदर अग्रवाल लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन-बी की एक खुराक से कालाजार के इलाज की विधि खोजी और कालाजार की वैक्सीन के शोध में भी शामिल रहे.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद बोले- आज का दिन बहुत खास : KGMU के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद को श्वसन रोगों, टीबी और संबंधित विषयों पर सैकड़ों शोध पत्र प्रकाशित करने पर सम्मानित किया गया है. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा कि भारत सरकार का बहुत धन्यवाद है, जो मुझे इस योग्य समझा. आज का दिन मेरे लिए बहुत खास है.

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने KGMU में फैकल्टी सदस्य के रूप में शुरुआत की और बाद में पल्मोनरी (रेस्पिरेटरी) मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष बनें. विभाग ने संक्रमण, टीबी, अस्थमा, सीओपीडी, फेफड़ों के कैंसर और अन्य जटिल श्वसन रोगों के इलाज और शिक्षा के क्षेत्र में बड़े बदलाव किए. उन्होंने विभाग को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया. जैसे वीडियो ब्रोंकोस्कोपी यूनिट, स्लीप लैब, थोरेसकोपी यूनिट, आदि. विभाग के 14 साल के नेतृत्व में इसे एक राष्ट्रीय स्तर के उत्कृष्ट केंद्र के रूप में स्थापित किया.

उन्होंने श्वसन रोगों, टीबी और संबंधित विषयों पर सैकड़ों शोध पत्र, समीक्षा लेख और कुछ पुस्तकें भी लिखीं. कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा संस्थानों में मुख्य भूमिका निभाई है और मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में मार्गदर्शक रहे हैं. सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद वह इरा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में मेडिकल एजुकेशन निदेशक और पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे हैं.

डॉ. ठकराल बोले- सौभाग्य की बात : वहीं डॉ. केवल किशन ठकराल ने कहा कि अपने गुरुजनों और वरिष्ठ जनों के आशीर्वाद के कारण आज यह सौभाग्य मिला है. शुरुआत से ही गुरुजनों ने मार्गदर्शन किया जिसकी वजह से आज यह सौभाग्य मिला है. अभी भी जनता की सेवा करना हमारा मुख्य उद्देश्य है. आयुर्वेद विधा में शल्य चिकित्सा को बढ़ोतरी देने के लिए लगातार काम किया है. यही वजह है कि आज इस सम्मान से नवाजा जा रहा है. इसके लिए बहुत खुश हूं.

बता दें कि डॉ. ठकराल आयुर्वेद में शल्य (सर्जरी) के विशेषज्ञ माने जाते हैं और उन्होंने क्षार सूत्र चिकित्सा तकनीक में विशेष कार्य किया है, जो पाइल्स, फिस्टुला और अन्य मलाशय रोगों में प्रयोग की जाती है. क्षार सूत्र पद्धति आयुर्वेद शल्य चिकित्सा की एक पारंपरिक पद्धति है. जिसमें औषधि-लगे धागे का उपयोग कर रोगग्रस्त ऊतकों का रासायनिक उपचार किया जाता है. उन्होंने अनेक छात्रों को आयुर्वेद शल्य चिकित्सा और क्षार सूत्र विधियों पर शिक्षित किया और शल्य चिकित्सा का मानकीकरण करने में योगदान दिया.

अनिल रस्तोगी को कलाकालों ने दी बधाई : वहीं लखनऊ के कालाकर अनिल रस्तोगी को भी पद्म श्री सम्मान मिला है. अनिल रस्तोगी कई बॉलीवुड फिल्मों में अहम किरदार निभा चुके हैं. उनके इस योगदान के लिए ही सरकार ने उन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया है. अनिल रस्तोगी को पुरस्कार मिलने के बाद विभिन्न कलाकारों ने उन्हें बधाई दी है.

कलाकार राकेश पांडेय निश्चल ने कहा, लखनऊ के प्रसिद्ध रंगकर्मी, वैज्ञानिक और फिल्म अभिनेता डॉ. अनिल रस्तोगी को कला और अभिनय के क्षेत्र में उनके शानदार योगदान के लिए पद्मश्री 2026 से सम्मानित किया गया है. उन्होंने 64 वर्ष से अधिक वर्षों के अपने करियर में 100 नाटक, 75 से अधिक फिल्में और कई वेब सीरीज और टीवी धारावाहिकों में अभिनय किया है.

अनिल रस्तोगी का जन्म चार अप्रैल 1943 को लखनऊ में हुआ था. सीडीआरआई में वैज्ञानिक रहे अनिल रस्तोगी ‘दर्पण’ नाट्य समूह से जुड़े रहे. इश्कजादे, मुल्क, द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर समेत कई प्रमुख फिल्मों में काम किया. ‘गुल्लक’, ‘पंचायत’, ‘आश्रम’ जैसी वेब सीरीज में सशक्त चरित्र भूमिकाओं के लिए वे जाने जाते हैं. उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और यश भारती सम्मान से भी नवाजा जा चुका है.

कृषि क्षेत्र में उत्कृष्ट काम : अशोक कुमार सिंह ने 25 से अधिक चावल की किस्में विकसित कीं. इनसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और किसानों की आजीविका में सुधार लाने में मदद मिली. भारत की पहली जीनोम-संपादित चावल की किस्म के सह-विकास में भी उनका योगदान रहा.

गुप्त अभिलेखों का लगाया पता : बुद्ध रश्मी मणि उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध पुरातत्वविद् और विरासत संरक्षणवादी हैं. उन्होंने सबसे पुराने गुप्त शिलालेखों का पता लगाया और अयोध्या और सारनाथ में उत्खनन का नेतृत्व किया. उन्होंने संग्रहालयों को पुनर्जीवित किया और प्रभावशाली कृतियों की रचना की.

पैरालंपिक में सबसे कम उम्र के खिलाड़ी : दिव्यांग खिलाड़ी प्रवीण कुमार को पैरालंपिक में स्वर्ण पदक मिल चुका है. ऊंची कूद के खिलाड़ी हैं. लगातार दो पैरालंपिक पदक जीतने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी.

पीतल उत्पादों पर की नक्काशी : मुरादाबाद के शिल्पगुरु चिरंजीलाल यादव (65) पीतल उत्पादों पर नक्काशी का काम करते हैं. चिरंजी लाल यादव को पहले भी कई नेशनल और स्टेट अवार्ड मिल चुके हैं. इनके दो बेटों में बड़े बेटे भी शिल्पकार हैं और नेशनल अवार्ड हासिल कर चुके हैं. चिरंजीलाल यादव ने मुरादाबाद सहित आसपास के युवाओं को भी शिल्पकारी की कला सिखाई है. चिरंजीलाल यादव ने बताया, आवेदन करने के बाद अपने काम में लग गए थे और जब उनको खबर मिली कि उनको पद्मश्री के लिए चुना गया है तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा.

कृषि को दिया बढ़ावा : रघुपति सिंह को मरणोपरांत पद्मश्री अवार्ड दिया जाएगा. पांच दशकों से अधिक समय तक सतत कृषि को बढ़ावा दिया और लगभग 100 किस्मों का विकास किया. उत्तर प्रदेश सरकार से कृषि पंडित सम्मान पा चुके रघुपत सिंह जैविक और नवीन खेती में माहिर थे. रघुपत सिंह का खेती करने का तरीका अलग था वह देसी तरीकों से बीजों का संशोधन करके लौकी को 5 फीट से 7 फीट तक हो जाती थी. 1 जुलाई 2025 को रघुपति सिंह का देहांत हो गया था. उनकी ओर से उनके बड़े बेटे सुरेंद्र पाल सिंह यह पुरस्कार लेंगे.

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