कानपुर / लखनऊ: भारत में सस्टेनेबल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। एक नई पीढ़ी की HVAC (एयर कंडीशनिंग) तकनीक ने AC से निकलने वाले ड्रेन पानी के प्रबंधन को पूरी तरह बदलने की दिशा में क्रांतिकारी कदम उठाया है।
यह अत्याधुनिक तकनीक AC से निकलने वाले पानी को व्यर्थ बहने से रोकती है और उसे स्वतः एकत्रित कर रीसायकल करते हुए उपयोगी हवा में परिवर्तित करती है। इससे न के
ल इंडोर एयर क्वालिटी में सुधार होता है, बल्कि जल संरक्षण को भी बढ़ावा मिलता है, जो आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक उन स्थानों के लिए अत्यधिक उपयोगी है जहां बड़ी संख्या में एयर कंडीशनर का उपयोग होता है—जैसे ऑफिस, बैंक, मॉल और अन्य कमर्शियल बिल्डिंग्स। पारंपरिक प्रणालियों में जहां पानी को कंटेनरों में जमा कर बार-बार खाली करना पड़ता है, वहीं यह नई तकनीक पूरी प्रक्रिया को ऑटोमेटेड, स्मार्ट और मेंटेनेंस-फ्री बना देती है।
इस इनोवेशन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली है। इसका PCT आवेदन World Intellectual Property Organization (WIPO) के अंतर्गत दर्ज किया गया है, जो इसकी वैश्विक उपयोगिता और व्यावसायिक संभावनाओं को दर्शाता है।
👉 PCT Application Number: PCT/IB2025/061999
साथ ही, भारत में भी इस तकनीक को पेटेंट संरक्षण प्राप्त हो चुका है।
👉 India Patent Certification:
It is hereby certified that a patent has been entitled “A System for Water Recycling in an Air Conditioner” as disclosed in the above mentioned application for a term of 20 years from 28th November 2024, in accordance with the provisions of The Patents Act, 1970.
इस तकनीक का पेटेंट शकीला बानो (निवासी: कमालपुर, कड़ा, कौशांबी, उत्तर प्रदेश) के नाम से दर्ज है, जबकि इसके इनोवेटर मोहम्मद साहिल हैं, जिन्होंने इस अनोखी तकनीक को विकसित किया।
पेटेंट प्रक्रिया में Mr. Suneet Sabale और उनकी टीम Brainiac IP Solutions का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिन्होंने इस इनोवेशन को मजबूत बौद्धिक संपदा (IP) आधार प्रदान किया।
इसके अलावा, इस प्रोजेक्ट को HBTU-TBIF (Harcourt Butler Technical University – Technology Business Incubator Foundation) का सहयोग प्राप्त हुआ है, जिसका नेतृत्व जितेंद्र भास्कर कर रहे हैं।
📢 विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक आने वाले समय में HVAC इंडस्ट्री में एक नया मानक स्थापित कर सकती है और “वेस्ट वाटर टू वैल्यू” की दिशा में एक मजबूत कदम साबित होगी।
