प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि किसी मामले में सिर्फ शिकायतकर्ता का एससी-एसटी वर्ग का होना एक्ट लगाने के लिए काफी नहीं है, जब तक यह साबित न हो कि अपमान जाति के आधार पर जानबूझकर शर्मिंदा करने की नीयत से किया गया। इसके लिए जातिसूचक गाली/अपमानजनक भाषा का विशिष्ट आरोप एफआईआर में होना जरूरी है। यह आदेश न्यायमूर्ति संतोष राय ने अमरनाथ चौधरी की अपील पर दिया है। सिद्धार्थनगर के इटवा थाने में दर्ज केस में चार्जशीट दाखिल होने के बाद स्पेशल जज सिद्धार्थनगर के संज्ञान/सम्मन आदेश को चुनौती दी गई थी।
अपीलार्थी ने फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवाया था, जिसकी शिकायत करने पर उसने मारपीट की। दलील दी गई कि एफआईआर में कोई जातिसूचक गाली या अपमानजनक शब्द अपीलार्थी पर आरोपित ही नहीं है। कोर्ट ने कहा एफआईआर पढ़ने से ही लगता है कि कोई जातिगत गाली या अपमानजक भाषा अपीलार्थी द्वारा प्रयोग ही नहीं की गई जिससे लगे कि एससी/एसटी होने के कारण अपमानित किया गया। कोर्ट ने अपीलार्थी को एससी/एसटी एक्ट के आरोप से मुक्त कर दिया और कहा कि मारपीट का केस चलेगा।
वकील के चैंबर के ध्वस्तीकरण पर सोमवार को होगी सुनवाई
वहीं दूसरे मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक अधिवक्ता के चैंबर के आंशिक ध्वस्तीकरण को चुनौती देने वाली याचिका को इसी मुद्दे से संबंधित एक लंबित जनहित याचिका के साथ जोड़ने का रविवार को निर्देश दिया। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 26 अक्टूबर की तारीख तय की है। न्यायाधीश न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह और न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने राजेश कुमार दीक्षित की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। दीक्षित ने अनुरोध किया था कि राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को उनके चैंबर को ध्वस्त करने से रोकने का निर्देश दिया जाए। मामले की तात्कालिकता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश के निर्देश पर 25 अक्टूबर को विशेष पीठ गठित की गई और शाम चार बजकर 45 मिनट पर सुनवाई हुई।
