नूरपुर (कांगड़ा)। हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से नए जिलों के गठन के लिए आयोग गठित करने से नूरपुर के लोगों में आस जगी है। पिछले लगभग 24 साल से जिला बनने की राह देख रहे नूरपुर की उम्मीदें एक बार फिर जागृत हुई हैं। प्रदेश में प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के लिए आयोग के गठन से क्षेत्रवासियों को मांग पूरी होने की आस बंधी है।
वर्ष 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की सरकार ने नए जिलों के गठन की कवायद शुरू की थी व नूरपुर में अतिरिक्त उपायुक्त (विकास) की तैनाती की थी, लेकिन 2003 में सत्ता परिवर्तन के बाद उस समय की कांग्रेस सरकार ने उक्त कार्यक्रम को बंद कर दिया। तब से नूरपुर को जिला बनाने की मांग समय-समय पर उठती रही, मगर नतीजा नहीं निकला।
पुलिस जिला स्थापित
पूर्व जयराम सरकार में तत्कालीन वन मंत्री राकेश पठानिया के कार्यकाल में नूरपुर में पुलिस जिला स्थापित हुआ। यहां दो अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय भी संचालित हैं। इसके बावजूद नूरपुर को पूर्ण प्रशासनिक जिला बनाने की मांग अधूरी है।
जनसंख्या व परिस्थिति का आकलन
प्रदेश सरकार ने प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के लिए चार सदस्यीय आयोग गठित किया है, जिसे छह माह के भीतर रिपोर्ट सौंपनी है। आयोग जिलों, उपमंडलों, तहसीलों और अन्य प्रशासनिक इकाइयों की जरूरतों का आकलन करेगा। इसमें भौगोलिक परिस्थितियों, जनसंख्या, प्रशासनिक सुविधा और वित्तीय संसाधनों को आधार बनाया जाएगा।
क्यों उठती रही जिला की मांग
नूरपुर को जिला बनाने के पक्ष में प्रमुख तर्क जिला मुख्यालय धर्मशाला से दूरी और लोगों को सरकारी कामकाज के लिए होने वाली परेशानी है। नूरपुर, इंदौरा, फतेहपुर और जवाली क्षेत्र के लोगों को स्थानीय स्तर पर जिला मुख्यालय मिलने से समय और यात्रा खर्च बचने की उम्मीद है। डमटाल से धर्मशाला की दूरी करीब 90 किलोमीटर है।
4 जिलास्तरीय कार्यालय चल रहे नूरपुर में
वर्तमान में नूरपुर में जिलास्तरीय पुलिस अधीक्षक कार्यालय, दो जिला स्तरीय सेशन कोर्ट, राजस्व जिला व आरटीओ कार्यालय हैं। ऐसे में नूरपुर प्रशासनिक जिला बनने की हर औपचारिकता पूरी करता है। अब क्षेत्रवासियों की निगाहें आयोग की सिफारिशों और सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी हैं।
