देहरादून। उत्तराखंड में 2027 की चुनावी तैयारी अब संगठनात्मक बैठकों से आगे बढ़कर सीटवार राजनीतिक गणित साधने की दिशा में जाती दिख रही है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन 9-10 सितंबर को कुमाऊं के दौरे पर रहेंगे।
हल्द्वानी में प्रदेश कार्यसमिति और कोर कमेटी की बैठक के साथ उनका प्रवास हो रहा है। ऐसे में कुमाऊं की उन विधानसभा सीटों पर विशेष मंथन होगा, जहां 2022 में भाजपा को हार मिली थी या वह बेहद कम अंतर से जीत पाई थी।
राजनीतिक तौर पर देखें तो भाजपा के लिए कुमाऊं इसलिए अहम है क्योंकि 29 विधानसभा सीटों वाले इस मंडल में 2022 में पार्टी ने 18 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस के खाते में 11 सीटें गई थीं। यानी प्रदेश में भाजपा की मजबूत स्थिति के बावजूद कुमाऊं में विपक्ष के लिए पर्याप्त राजनीतिक जमीन बनी रही।
127 और 182 वोट का मामूली अंतर
भाजपा के लिए 2022 का सबसे बड़ा सबक अल्मोड़ा और द्वाराहाट जैसी सीटें हैं। अल्मोड़ा में भाजपा महज 127 वोट से चुनाव हारी थी, जबकि द्वाराहाट में हार का अंतर 182 वोट रहा। इतनी मामूली हार बताती है कि यहां चुनावी मुकाबला मूल रूप से भाजपा-कांग्रेस के बीच ही रहा और कुछ सौ वोटों का अंतर ही भाजपा की ताजा चुनौती हैं।
यही वजह है कि 2027 की रणनीति में ऐसी सीटें स्वाभाविक रूप से भाजपा के ‘रिकवरी टारगेट’ में ऊपर रहेंगी। यहां पार्टी के सामने सवाल केवल संगठन मजबूत करने का नहीं होगा, बल्कि स्थानीय नाराजगी, प्रत्याशी की स्वीकार्यता, गुटीय समीकरण और बूथ स्तर की कमजोरी को पहचानने का होगा।
हार वाली सीटों में भी कई जगह वापसी की गुंजाइश
कुमाऊं में भाजपा 2022 में जिन सीटों पर हारी, उनमें धारचूला और बाजपुर जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं। धारचूला में हार का अंतर करीब 1,100 वोट और बाजपुर में करीब 1,600 वोट रहा। इन सीटों पर भाजपा के लिए चुनौती बड़ी जरूर है, लेकिन अंतर इतना नहीं था कि राजनीतिक समीकरण को पूरी तरह एकतरफा माना जाए।
इसके विपरीत हल्द्वानी, किच्छा और नानकमत्ता जैसी सीटों पर पिछली हार का अंतर अपेक्षाकृत बड़ा था। इसलिए भाजपा के लिए इन सीटों की रणनीति अल्मोड़ा-द्वाराहाट जैसी सीटों से अलग होगी। यहां सिर्फ बूथ मैनेजमेंट पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सामाजिक समीकरण और स्थानीय नेतृत्व को लेकर भी नए सिरे से काम करना पड़ेगा।
जीती सीटों पर भी खतरा-कम मार्जिन वाली जीत चिंता
भाजपा की रणनीति का दूसरा पहलू उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। पार्टी को केवल हारी हुई सीटें वापस नहीं लानी हैं, बल्कि 2022 में कम अंतर से जीती सीटों को बचाना भी है।
गदरपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां भाजपा के अरविंद पांडे महज 1,120 वोट से जीते थे। भाजपा को 52,841 और कांग्रेस को 51,721 वोट मिले थे। यानी दोनों दलों के बीच वोटों का अंतर बहुत सीमित था।
इसी तरह रानीखेत, दिदीहाट, साल्ट और कपकोट जैसी सीटों में भी जीत का अंतर बहुत बड़ा नहीं था। ऐसे में भाजपा का चुनावी गणित दोहरी चुनौती वाला है, जहां हारी वहां वापसी और जहां कम अंतर से जीती वहां बढ़त मजबूत करना।
नवीन के सामने तीन सवाल
नितिन नवीन के दौरे में कुमाऊं को लेकर सबसे अहम सवाल यही होंगे कि पिछले चुनाव में कमजोर प्रदर्शन क्यों हुआ, मौजूदा विधायकों और स्थानीय संगठन की स्थिति क्या है और 2027 में किन सीटों पर अतिरिक्त राजनीतिक निवेश की जरूरत है।
प्रदेश कार्यसमिति और कोर कमेटी की बैठक का घोषित फोकस संगठन तथा आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति पर है। ऐसे में बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने और चुनावी रणनीति को धार देने के साथ सीटवार फीडबैक महत्वपूर्ण हो सकता है।
अल्मोड़ा-द्वाराहाट से गदरपुर तक ‘माइक्रो मैनेजमेंट’
भाजपा के लिए कुमाऊं में एक दिलचस्प स्थिति है। अल्मोड़ा और द्वाराहाट में पार्टी को कुछ सौ वोटों ने सत्ता से बाहर रखा, जबकि गदरपुर में करीब एक हजार वोटों ने पार्टी को जीत दिलाई।
यही अंतर 2027 की भाजपा रणनीति का आधार बन सकता है। पार्टी अगर इन सीटों पर पिछले चुनाव के बूथवार आंकड़े, जातीय-सामाजिक समीकरण, स्थानीय मुद्दे और प्रत्याशी की स्वीकार्यता को जोड़कर काम करती है तो कुमाऊं में कुछ सीटों पर परिणाम पलटने की संभावना बन सकती है।
राजनीतिक संदेश साफ है,2027 में भाजपा की नजर सिर्फ सीटों की संख्या पर नहीं, बल्कि हर उस वोट पर होगी है जो 2022 में जीत और हार के बीच खड़ा था।
इन सीटों पर फोकस
- अल्मोड़ा,
- द्वाराहाट,
- धारचूला,
- बाजपुर,
- गदरपुर,
- रानीखेत,
- डीडीहाट,
- सल्ट,
- कपकोट,
- हल्द्वानी,
- किच्छा,
- नानकमत्ता
इस लिहाज से नितिन नवीन का हल्द्वानी दौरा महज संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि 2027 के लिए कुमाऊं के चुनावी नक्शे पर कमजोर और सुरक्षित सीटों की पहचान का शुरुआती चरण माना जा सकता है।
