चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती अब विपक्ष नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती गुटबाजी बनती जा रही है। कांग्रेस हाईकमान की ओर से एकजुट होकर चुनावी तैयारी करने के स्पष्ट संदेश के बावजूद प्रदेश में संगठन दो धड़ों में बंटा नजर आ रहा है।
पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल के दस दिवसीय दौरे के दौरान सामने आए घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया है कि पार्टी के भीतर का विवाद अभी थमने वाला नहीं है। भूपेश बघेल 31 जुलाई से पंजाब दौरे पर हैं।
बघेल हर बूथ कांग्रेस मजबूत कार्यक्रम के तहत ब्लाक और जिला स्तर पर बैठकों के जरिए विधानसभा चुनाव को लेकर संगठन की तैयारियों की समीक्षा कर रहे हैं। हालांकि उनके कार्यक्रमों में ही विरोध के स्वर खुलकर सामने आने लगे हैं। शनिवार को पहले पटियाला और फिर संगरूर में आयोजित कार्यक्रम में प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के खिलाफ नारेबाजी हुई।
प्रदर्शनकारियों ने भूपेश बघेल के खिलाफ भी मुर्दाबाद के नारे लगाए
संगरूर में प्रदर्शनकारियों ने भूपेश बघेल के खिलाफ भी मुर्दाबाद के नारे लगाए और दोनों गुटों के कार्यकर्ता आमने-सामने आ गए। स्थिति हाथापाई तक पहुंच गई, जिससे पार्टी की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई।
कांग्रेस के भीतर यह टकराव एक जुलाई को नई चुनाव प्रबंधन समितियों की घोषणा के बाद और तेज हो गया था। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और उनके समर्थक लगातार संगठन में बदलाव तथा प्रदेश अध्यक्ष को बदलने की मांग कर रहे हैं।
दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान के साथ कई दौर की बैठकों के बावजूद चन्नी खेमा अपनी मांगों पर कायम है। इसका असर अब पार्टी के संगठनात्मक कार्यक्रमों पर भी दिखाई देने लगा है।
दो बार पंजाब गए भूपेश बघेल
हाईकमान के निर्देशों के बाद से पिछले एक महीने के भीतर दूसरी बार पंजाब पहुंचे भूपेश बघेल को गुटों के बीच समन्वय स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, लेकिन अब तक उनकी कोशिशें सिरे नहीं चढ़ पाई हैं।
चन्नी समर्थकों के साथ ही कई बड़े कांग्रेस नेताओं ने जिला स्तर पर आयोजित बैठकों से दूरी बनाए रखी। कार्यक्रमों में पहुंचे भूपेश बघेल और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के विरोध में जमकर नारेबीजी हुई है।
कांग्रेस के कार्यक्रमों में विरोध के ताजा घटनाक्रमों के बाद माना जा रहा है कि पूरी रिपोर्ट अब कांग्रेस हाईकमान तक पहुंचेगी। ऐसे में नेतृत्व के सामने दो ही विकल्प दिखाई दे रहे हैं या तो लगातार अनुशासनहीनता और गुटबाजी करने वाले नेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, अथवा प्रदेश नेतृत्व में बदलाव कर असंतुष्ट खेमे को साधने की कोशिश की जाए।
विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए संगठनात्मक एकता अब सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा बन गई है। बघेल कई बार कह चुके हैं कि हाईकमान का फैसला नहीं बदला जाए। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि फैसला बदलना कोई गुड्डे गुड़िया का खेल नहीं है।
