पंचकूला। सोमवार को राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले चुनाव में तीनों निर्दलीय विधायक ही गुप्त मतदान कर पाएंगे। भाजपा, कांग्रेस और इनेलो के विधायकों को अपनी पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाने के बाद ही बैलेट बॉक्स में वोट की पर्ची डालने का अधिकार होगा।
अगस्त 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौरान संसद द्वारा लोक प्रतिनिधित्व कानून, 1951 (आरपी एक्ट ) में संशोधन किया गया था। इसमें यह प्रविधान किया गया था कि राज्यसभा की सीटों के निर्वाचन हेतु होने वाली वोटिंग में ओपन बैलट से वोट दिए जाएंगे। यानी कि ऐसे चुनावों में मतदान गुप्त नहीं होता।
उक्त कानूनी संशोधन लागू होने के बाद केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय द्वारा फरवरी 2004 में इस संबंध में निर्वाचन संचालन नियमावली, 1961 में भी उपयुक्त संशोधन किए गए थे।
क्या बोले एक्सपर्ट?
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट और संवैधानिक विशेषज्ञ हेमंत कुमार ने बताया कि राज्यसभा के लिए होने वाले मतदान से पूर्व हर उस राजनीतिक दल, जिसके सदस्य संबंधित विधानसभा के सदस्य हों, के अध्यक्ष या महासचिव को बाकायदा फार्म 22 ए में पार्टी के दो वरिष्ठ नेताओं को अधिकृत एजेंट के रूप में नियुक्त करना होता है। उनका कार्य यह सुनिश्चित करना होगा कि उनकी पार्टी के विधायकों ने राज्य सभा चुनाव में मतदान के दौरान किसको वोट डाला है।
मतदान के दिन पार्टियों के अधिकृत एजेंट मतदान केंद्र के अंदर ही बैठते हैं। जब संबंधित पार्टी का विधायक मतदान के निर्वाचन अधिकारी से बैलेट पेपर प्राप्त करने के बाद उस पर पहली, दूसरी, तीसरी प्राथमिकता अंकित करता है तो उसे भरे हुए बैलेट पेपर को बैलट बाक्स में डालने से पूर्व अधिकृत एजेंट को दिखाना अनिवार्य होता है।
एजेंट को वोट दिखाना अनिवार्य
अगर वह ऐसा नहीं करता तो उस विधायक का वोट अमान्य माना जाता है एवं उसे रद कर दिया जाता है। अगर विधायक ने पार्टी के अधिकृत एजेंट के स्थान पर किसी अन्य को अपना वोट दिखाया, तो उस परिस्थिति में भी वह वोट रद कर दिया जाता है। मतगणना के बाद बैलेट पेपरों को सील करने से पूर्व भी रिटर्निंग अधिकारी द्वारा पार्टी के अधिकृत एजेंट्स को उनके पार्टी विधायकों द्वारा डाले गए वोट दिखाए जाते हैं।
